Ganesha Pancharatnam: Mudakaratta Modakam -Shloka 5

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गणेशपञ्चरत्नम् - श्लोक ॥ ५ ॥
नितान्त कान्त दन्त कान्ति मन्त कान्त कात्मजम् ।
अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनाम् ।
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ ५ ॥

गणेशपञ्चरत्नम् - श्लोक ५ - भावार्थ :
मैं हमेशा उस एक दन्त भगवान पर ही ध्यान करता हूँ जिनका निरंतर शोभायमान उज्ज्वल चमकदार दन्त बहुत सुंदर है।
जो उस भगवन के पुत्र है जिन्होंने यम को भी निरुद्ध किया था ।
जिनका अकल्पनीय प्रपत्र (रूप) समझ से बाहर है और असीमित रूप से भक्तों के असंख्य असीम बाधाओं को हटाते हैं ।
जो, बसंत के मौसम की तरह, योगियों के हृदय में हमेशा के लिए बस्ते हैं ।
इस एक दन्त भगवान को मैं वास्तव में लगातार प्रतिबिंबित और चिंतन करता हूँ ॥ ५॥

Ganesha Pancharatnam: Shloka - 5 (Meaning) :
I always meditate only on that God with single tusk, Whose ever lustrous tusk is very pretty,
Who is the son of Lord who obstructed the god of death, and Who has a form beyond ones imagination,
Who is endless, Who tears asunder all obstacles, Who dwells forever in the heart of Yogis , Like the season of spring. I Continually Reflect upon Him, the Ekadanta ॥ 5 ॥

Original photo credits: Duta User Mr. Deepak Tak (702*84)
मूल फोटो क्रेडिट: Duta उपयोगकर्ता श्री.दीपक ताक (७०२
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