गणेशपञ्चरत्नम् - श्लोक - ४ / Ganesha Pancharatnam - Verse - 4

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श्लोक:

अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम् ।

पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।

प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् ।

कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम् ॥ ४ ॥

श्लोक भावार्थ:

उस प्राचीन गज मुख भगवन को मेरा प्रणाम - जो वंचितों के चाहता नष्ट कर देता है, जो प्राचीन काल से पूजा जाता है ।

जो उस भगवान के ज्येष्ठ पुत्र हैं, जो त्रिपुरा शहर के असुरों को मार दिया , जो देवताओं के दुश्मनों का गर्व और घमंड को चबाते है ।

जो अंतिम नाश के समय में भयानक रूप लेते हैं ; जो गहने के रूप में धनञ्जय जैसे नाग को पहनते हैं । जिनके गाल (कपोल) से कृपा, दयालुता और अनुग्रह का प्रवाह है, जैसे पुराणों में उनका स्तुति (स्तवन) का प्रवाह है ॥ ४ ॥

Verse meaning:

I salute the very ancient elephant-god Who destroys the wants of the have- nots,

Who has been worshipped since ancient times, Who is the eldest son of the lord who destroyed Tripura cities, Who destroys the pride of the enemies of gods, and Who is awesome at the time of final deluge,

Who wears serpents like Dhananjaya as ornaments, Whose cheeks oozes and flows with Divine Grace,

Salutations to Him, Whose Praise similarly flows down like Juice, from the Puranas. ( 4 )

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