[madhya-pradesh] - मस्जिद जाने से गुरेज नहीं तो फिर सियासत में भागीदार बनाने से एतराज क्यों?

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मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव है, लिहाजा नेताओं को न तो मंदिर और न ही मस्जिद जाने से गुरेज है. वोट के लिए मदंरि-मस्जिद जाते जरूर हैं, लेकिन सियासत में भागीदारी देने पर नेताओं के पैमानों में दोहरापन क्यों आ जाता है. यह सवाल इसलिए है क्योंकि अगर प्रदेश के सियासी अतीत को देखें तो 11 फीसदी वोटबैंक होने के बावजूद विधानसभा में पहुंचने वाले अल्पसंख्यक विधायकों की संख्या कम से कम है. आखिर क्यों विधानसभा में अल्पसंख्यकों को पहुंचाने में सियायी दलों की दिलचस्पी नहीं है.

प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अपने-अपने दलों की जीताने के लिए केंद्रीय नेतृत्व भी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. हाल ही में अपने चुनावी एजेंडे के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदौर में बोहरा समाज के कार्यक्रम में पहुंचे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी ग्वालियर की मस्जिद में टोपी पहनते हुए नजर आये थे. इससे तस्दीक होता है कि सियासत के पाले में भले ही अलग हो लेकिन चुनाव जीतने के उनके तरीकों से सियासी मजमून एक से ही है....

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