[lalitpur] - आदर्श गांव पारौल में विकास का इंतजार

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ङोगराखुर्द (ललितपुर)। बुंदेलखंड के अति पिछड़े जिले में वन्य क्षेत्र से घिरे पारौल गांव में अब तक विकास नजर नहीं आ रहा है। यहां सहरिया आदिवासी कच्चे झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं तो सड़कों के किनारे गंदगी व रिपटों पर फैलता गंदा पानी इस बात की गवाही दे रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस गांव को केंद्रीय मंत्री/क्षेत्रीय सांसद उमा भारती ने आदर्श बनाने के लिए गोद ले रखा है।

दूरदराज क्षेत्र में स्थित ब्लॉक मड़ावरा के ग्राम पारौल का समग्र विकास कराने का जिम्मा केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने लिया है, लेकिन आठ माह गुजरने के बाद भी गांव की सूरत नहीं बदल पाई है। आदर्श ग्राम के नाम पर ग्रामीणों के साथ छलावा किया जा रहा है। जो सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं हैं, उनका लाभ भी ग्रामीणों को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। सहरिया परिवार के लोग आज भी झुग्गी-झोपड़ियों में रहकर गुजारा कर रहे हैं और जानवरों के रहने के लिए के लिए घरों के सामने ही झाकड़ लगाकर बारी लगाए हुए हैं। तथा बरसात के दिनों में तो और बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ हैं। आवास, शौचालय, सड़क अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य बिजली जैसी सुविधाओं से काफी दूर हैं। लोग विकास की बाट जोह रहे हैं यहां विकास का इतना अभाव है कि लोगों को दिनभर में मात्र पांच घंटा मिल रही है। सहरिया बस्ती में विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन, आवास योजना, शौचालय, सड़क बिजली, पानी जैसी मूलभूत जनसुविधा उपलब्ध नहीं है। गांव में जगह-जगह गंदगी फैलीं गलियों में कीचड़ रहता है और लोग उन्हीं कीचड़ युक्त गलियों से गुजरने को मजबूर हैं। शौचालयों के अभाव में खुलें में शौच क्रिया करने जाते हैं, जिससे संक्रमित बीमारी फैलने का भय बना रहता है। गांव की दुर्गा बस्ती के लोगों ने बताया कि सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है हम। ग्रामीणों का आरोप है कि लोगों के साथ सोतेला व्यवहार किया जा रहा है। डीएम मानवेंद्र सिंह द्वारा बीते बर्ष फरवरी माह में यहां जन चौपाल लगाकर गांव का भ्रमण किया था। इस दौरान विद्यालय में गंदगी स्वास्थ्य सेवाएं ठप मिली थी। उसी समय डीएम ने गांव को आदर्श बनाने के अधिकारियों को निर्देश दिये थे, लेकिन गांव की हालत जस की तस बनी हुई है। उप स्वास्थ्य केंद्र एक महीने में चालू के निर्देश दिए थे, लेकिन अभी तक चालू नहीं है और उप स्वास्थ्य केंद्र में जानवरों का ङेरा रहता है गंदगी भरमार पड़ी है और इसी प्रकार सरकारी विद्यालयों में गंदगी व्याप्त है। गोंवंश विद्यालयों को अपना आशियाना बनाकर डेरा डाले रहते हैं। उप स्वास्थ्य केंद्र होने के बाद भी प्रसव के दौरान मड़ावरा अस्पताल ले जाना पड़ता है, ऐसे में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं एवं गांव में शमशान घाट नहीं होने से बङी मुश्किल होती है अगर बरसात में किसी की मृत्यु हो जाती हैं तो दाह संस्कार के दौरान काफी परेशानी होती है। बता दें कि ग्राम में मतदाता की संख्या तीन हजार केे पार है। विधानसभा चुनाव के दौरान यहां के लोगों ने गांव के विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव का बहिष्कार किया था। इस दौरान तमाम राजनैतिक दलों के नेता तथा प्रशासनिक अधिकारियों के ठोस आश्वासन के बाद मतदान हो सका था। ग्रामीणों को तब आस जगी थी किअब गांव का तेजी से विकास होगा। गांव की उन्नति होगी लेकिन गांव का विकास कागजों में सिमटता दिखाई दे रहा है। जिससे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।...

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