[bihar] - ये हैं स्वच्छता के असली हीरो: आंखों से दिखाई नहीं देता, भीख मांगकर तैयार किया शौचालय

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कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों.... बिहार के सुपौल जिले के ताउमा वार्ड के निवासी मसहरू राम पर दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं। पूरा गांव इन्हें सूरदास कहकर पुकारता है। आंखों से दिखाई नहीं देता है, गरीबी ने शरीर को भी लाचार बना दिया है, इसलिए परिवार का भरण पोषण करने के लिए भीख मांगते हैं। मसहरू राम, गांव में घूम-घूमकर ढपली बजाते हैं, गीत गाते हैं। जो कुछ मिलता है उससे अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। 55 साल के मसहरू के परिवार में पत्नी और 5 बच्चे हैं।

कहते हैं कि सूरदास के काव्य में समाज बनने की प्रक्रिया को देखा जा सकता है। मसहरू राम का प्रयास भी बिहार में सफाई के प्रति लोगों के मन में बदलाव की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। भीषण गरीबी से जूझते हुए मसहरू के कानों में जब शौचालय और उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी पहुंची तो बंद आंखों से ही तय कर लिया कि मेरे घर में भी अपना शौचालय होगा। बस फिर क्या था, खुद से ही इस प्रयास में कदम बढ़ाने शुरू किए।

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