[chandauli] - इंटरनेट के युग विलुप्त हो रही पुस्तकें

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मुगलसराय। इंटरनेट के युग में किताबों को पढ़ने वालों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है। पाठकों की कमी की वजह से पुस्तकालयों की हालत भी अच्छी नहीं है। जिले के चकिया में 80 वर्ष पुराने आदित्य पुस्तकालय में पुस्तकों की कमी है। वहीं मुगलसराय में नगर पालिका का पुस्तकालय भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। दोनों पुस्तकालयों में जो गिनती की पुस्तकें बची भी हैं उन्हें न तो अब पढ़ने वाले हैं और न ही उन्हें संरक्षित करने का कोई जतन किया जा रहा है। सरकार और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते दोनों पुस्तकालय अपनी पहचान बचाने के लिए जूझ रहे हैं। जनपद भी साहित्यकारों की खान रहा है। बावजूद इसके प्रशासन की उपेक्षा की वजह से जिले के पुस्तकायलों में स्तरीय पुस्तकें पढ़ने को नहीं मिल रही है। वर्ष 1938 में चकिया में पूर्व काशी नरेश आदित्य नारायण सिंह ने आदित्य पुस्तकालय की स्थापना की। उस दौर से लेकर 80 के दशक तक पुस्तकालय में बड़े लेखकों की पुस्तकें उपलब्ध थी। इन्हें क्षेत्र के बुद्धिजीवी एवं अधिवक्ता निश्चित शुल्क देकर पढ़ते थे। धीरे-धीरे अच्छी पुस्तकों का स्थान उपन्यासों ने ले लिया। इसके कारण बुद्धिजीवी वर्ग का पुस्तकालय से मोहभंग हो गया। वर्तमान में पुस्तकालय चकिया बार एसोसिएशन के प्रबंधन में संचालित है। यहां उपन्यासों के अलावा इक्का-दुक्का ही स्तरीय पुस्तकें रह गई हैं। यही हाल मुगलसराय पुस्तकालय का भी है। कूड़ा बाजार चौकी पुलिस से सटे नगर पालिका के भवन में वर्ष 1987 में तत्कालीन जिलाधिकारी दिलीप कुमार ने उद्घाटन किया था। भवन जर्जर हो चुका है और फर्नीचर की स्थिति बदहाल है। यहां किताबें भी नाम मात्र की रह गई हैं। पालिका प्रशासन द्वारा कुछ वर्ष पहले लालबहादुर शास्त्री पार्क में पुस्तकालय की स्थापना की लेकिन आज तक न तो यहां पुस्तकें आई और न ही कर्मचारी की तैनाती हुई। नौगढ़ संवाददाता के अनुसार नक्सल क्षेत्र के सात गांवों में वरुण संस्था द्वारा पुस्तकालयों का संचालन किया जा रहा है। इन पुस्तकालयों में 3647 पुस्तकें हैं। इसमें सामान्य ज्ञान भूगोल इतिहास साहित्य स्वास्थ्य की कहानी और खेतीबारी की पुस्तकें शामिल है। वरुण संस्था के सचिव डॉ. एसपी सिंह ने बताया संस्था के पास 340 सदस्य हैं जिसमें पुस्तकालय में नियमित पाठकों की संख्या 82 है।

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