[varanasi] - होगा 70:30 का अनुपात तब बनेगी बात 0

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वाराणसी। काशी में घाटों को छोड़ चुकी गंगा के गिरते जलस्तर से शहरवासियों, आम श्रद्धालुओं के साथ ही नदी विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई हैं। अप्रैल महीने में ही मई-जून से भी बदतर हालात ने बेचैनी पैदा कर दी है। गंगा की जलधारा के साथ कभी न थमने वाली काशी में इसके कारणों पर मंथन तेज हो गया है। मौजूदा स्थिति से निबटने के लिए नदी विशेषज्ञ मानते हैं कि टिहरी और नरौरा में बने बांधों से जल छोड़कर तात्कालिक तौर पर राहत पाई जा सकती है। लेकिन, सिकुड़ते पाटों के बीच गंगा के अस्तित्व पर मंडराते संकट से पार पाने के लिए ठोस दीर्घकालिक योजना पर तत्काल अमल होना चाहिए। इस योजना में तीन बिंदुओं पर खास तौर से काम करना होगा। पहला, बांधों, परियोजनाओं में सरकार तीस फीसदी से अधिक जल का दोहन न करे। 70 फीसदी प्राकृतिक जल रहेगा तभी गंगा का अस्तित्व बच पाएगा।दूसरा, गंगा में सीवेज-नालों को गिरने से रोकने की योजना पर समयबद्ध तरीके से काम हो। तीसरा, शहरी क्षेत्रों में ड्रेजिंग कराकर गंगा की तलहटी में जमी गाद और बालू हटाई जाए। गैस आधारित या फिर विद्युत शवदाह गृह को बढ़ावा दिया जाए। नदी वैज्ञानिक प्रो. यूके चौधरी इनमें सबसे प्रमुख बिंदु गंगा का प्रवाह कायम रखना मानते हैं। कहते हैं कि अंग्रेजों ने नरौरा समेत जो बांध बनवाए थे वह गंगा को समाप्त करने के लिए थे। देश तो आजाद हो गया लेकिन गंगा आज भी अंग्रेजों के बनवाए उन बांधों में कैद हैं। गंगाजल का सौ फीसदी दोहन कर रही है जबकि गंगा के अस्तित्व के लिए जरूरी है कि कम से कम 70 फीसदी प्राकृतिक जल हो।गंगा बेसिन अथॉरिटी के पूर्व सदस्य और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के नदी विशेषज्ञ प्रो. बीडी त्रिपाठी सवाल उठाते हैं कि अब गंगा में गंगाजल है ही कहां? जो भी पानी है, वह नालों या सहायक नदियों का है। सैकड़ों नालों और कल-कारखानों का केमिकल सीधे गंगा में गिर रहा है। प्रवाहविहीन हो चुकी गंगा को आज सबसे अधिक प्रवाह की दरकार है। जिस ओर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। सरकार गंगा के प्रदूषण को खत्म करने की बात कह रही है लेकिन प्रवाह के बारे में कोई भी विचार नहीं कर रहा है।

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