[varanasi] - संकट मोचन में तीसरी निशा, संगीत की स्वरलहरियों के साथ गूंजे एकता के संदेश

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संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा सुधिजनों, श्रोताओं और काशी सभी के लिए यादगार बन गई। संगीत की स्वरलहरियों के साथ ही एकता, शांति और भारतीयता के संदेश की त्रिवेणी ने भी हर एक के हृदय को कहीं न कहीं जरूर छुआ। कला साधकों के मंच से कलाकारों ने जहां सधी हुई प्रस्तुतियां दीं।

पं. हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी ने तो तीसरी निशा को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। वहीं पहली बार जावेद अख्तर ने संगीत के मंच से रामायण और महाभारत से हर हिंदुस्तानी के रिश्ते को जोड़ा।

शुक्रवार को इससे पूर्व तृतीय संध्या के कार्यक्रमों की शुरूआत पंडित बिरजू महाराज की शिष्या महुआ शंकर के कथक से हुई। महुआ ने ताल धमार में चतुरंग से अपनी प्रस्तुति का श्रीगणेश किया। राग मारवा में निबद्ध रचना को आधार बनाकर की गई चतुरंग की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इसके उपरांत महुआ शंकर ने तीन ताल में पारंपरिक बंदिशें पेश कीं। फि र दादरा पर भाव नृत्य किया। विदुषी गिरिजा देवी उर्फ अप्पाजी की रचना दीवाना किए श्याम क्या जादू डाला् पर उनके भाव नृत्य को दर्शकों ने सराहा और मंत्रमुग्ध होकर देखते ही रह गए।

समापन उन्होंने तत्कार से किया। उनके साथ तबले पर उस्ताद अकरम खान सारंगी पर उस्ताद मुराद अली ने संगत की। हारमोनियम और गायन शोहेब हसन और बोल पढ़ंत नूपुर शंकर ने किया।

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