[agra] - यहां 'राम' के कांवड़ की गंगाजली तैयार करते 'रहीम'

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सोरों। क्षेत्र का गांव कादरवाड़ी गंगा जमुनी तहजीब का एक उदाहरण है। भले ही अपनी पेट की आग बुझाने के लिए लेकिन यहां के मुस्लिम परिवार कांवड़ियों के लिए पिछले कई सालों से गंगाजली तैयार कर रहे हैं। अब यह धंधा उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। लेकिन कई पीढ़ियों से चले आ रहे इस कार्य को वह बंद नहीं करना चाहते। उनके द्वारा तैयार की जाने वाली गंगाजली को बड़े व्यापारी खरीद लेते और बाद में कांवड़ियों को बेंचते। कांवड़ मेले के बाद इन मुस्लिम परिवारों को मजदूरी पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

गांव में इन दिनों तीन भट्टियों पर ही गंगा जली बनाने का काम चल रहा है। कारीगर कांच को आग में तपाकर सांचों की सहायता से गंगाजली का आकार देते हैं। प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करने वाले कारीगरों को इतना मुनाफा नहीं होता कि वह अपने परिवार का अच्छे से भरण पोषण भी कर सकें। यह काम सीजनल होता है। जो कांवड़ मेले के दिनों ही होता है। गंगाजली के लिए कांच फिरोजाबाद से मंगाया जाता है। ईधन के लिए कोयले व लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। धधकती आग के बीच काम करने वाले कारीगरों को सांस की बीमारी व अन्य त्वचा संबंधी रोग घेरे रहते हैं। इस गंगाजली निर्माण के काम में परिवार के सभी महिला पुरुष सदस्य लगते हैं। दिन में 300 गंगाजली ही तैयार हो पाती हैँ। जिनको बेचकर महज ढाई सौ रूपये प्रतिदिन का मुनाफा होता है। गंगाजली को सोरों के अलावा कछला, राजघाट से भी आकर व्यापारी खरीद ले जाते हैं। साल के बाकी बचे महीनों में यह कारीगर दूसरे के खेतों में मजदूरी या बाहर जाकर अन्य कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। ...

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