[mandsaur] - ‘मनुष्य के संस्कार ही है उसके श्रृंगार’

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मन्दसौर.

आदमी का श्रृंगार उसके संस्कारों से होता है। अपनी आत्मा को संस्कारित करने के लिए वर्षायोग के 120 दिन की यज्ञशाला में आना होगा। बहुत सारे मंदिर बन जाए उनमें प्रतिमाएं स्थापित हो जाएं किंतु मैंने मंदसौर में जीवित प्रतिमाएं बनाने का निश्चय किया है। यह बात आर्यिका सुभुषणमति माताजी ने कहीं। वे पाश्र्वनाथ जिनालय बंडीजी के बाग में महती धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि आवश्यकता है वर्षा योग में संस्कारों की यज्ञशाला में उपस्थित होनेे की। बालक के माता के गर्भ में आते ही संस्कार शुरू हो जाते है। चंदन खुशबु देता है बबूल नहीं। अत: हम चंदन की तरह बने बबूल की तरह नहीं और स्वयं संस्कारित हो। उन्होंने कहा कि केवल सेवा भावना से ही नहीं संस्कारी होने पर ही व्यक्ति देश, समाज व राष्ट्र का नाम ऊंचा करेगा। जो बच्चा संस्कारी होता है वही सच्चा श्रावक बनता है जो स्वयं को पहचान लेते है वे अपनी आत्मा को पहचान लेते है। बाल्यावस्था में मां, युवावस्था में गुरू संस्कारित करते है। कार्यक्रम का शुभारंभ ललित एवं बाला दोशी ने चित्र अनावरण कर किया। दीप प्रज्जवलन गोरेगांव, जबलपुर, इडर, कोपरगांव, उदयपुर, सलुम्बर, जयपुर, इंदौर, बडऩगर, जावरा, नीमच से आए गुरूभक्तों द्वारा किया गया। मंगलाचरण रचना दोशी ने प्रस्तुत किया। स्वागत चातुर्मास समिति के नरेश दोशी, दीपक भूता, सनत गांधी, कोमल जैन, जितेन्द्र दोशी, निर्मल मेहता, विशाल गोदावत, राकेश दोशी ने किया। झंडावंदन राजेन्द्र दोशी ने किया। संचालन चंदा कोठारी एवं कोमलप्रकाश जैन ने किया। आभार प्रवीण मिण्डा ने माना।...

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