[kota] - मौत के बाद अपने ही घर में अंतिम संस्कार

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कोटा. सत्तावन साल के प्रभुनाथ पिछले बीस साल से बोरखेड़ा में अपने मकान में रह रहे थे। उन्होंने घर के जिस आंगन में अपनी उम्र के काफी साल बिताए, जब उनकी मौत हुई तो शहरभर में कहीं उन्हें अंतिम संस्कार की जगह नहीं मिली, नतीजा अपने ही घर के आंगन में उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा, वहीं उनके परिवार ने उनकी समाधि बनाई।

प्रभुनाथ ऐसे अकेले शख्स नहीं हैं। कोटा में शहर में रहने वाले नाथ योगी समाज के अधिकांश घरों में उनके परिजनों का अंतिम संस्कार मजबूरी बन गया है। ऐसे घरों के आंगन में उनके पूर्वजों की समाधियां देखी जा सकती हैं। जिन घरों में आंगन नहीं हैं अथवा आंगन में समाधियां बन चुकी हैं। उन घरों में कमरों में अंतिम संस्कार कर समाधियां बनानी पड़ रही हैं। राज्य सरकार अथवा नगर विकास न्यास इस समाज को शहर में एक अदद मुक्तिधाम तक के लिए जमीन नहीं दे सका। समाज के करीब पचास हजार से अधिक लोग शहर में रहते हैं। कुन्हाड़ी में एक स्थान पर बरसों से जमीन के एक टुकड़े पर समाज अपने लोगों के अंतिम संस्कार करता रहा, जिसे 2013 में सरकार ने एक स्कूल को आवंटित कर दिया। पिछले महीने इस पर विवाद भी हो चुका है। इसके बाद समाज की मांग सरकार के कानों तक नहीं पहुंची।...

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