[jaipur] - लघुकथा-आकलन-नमिता हेमेश बंसल

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सुमित्रा देवी सोफे पर बैठी राम नाम लिख रही थीं। वो अपने काम में तल्लीन थी। रामदयालजी सुबह से तीन बार पढ़ चुके अखबार से टाइमपास करने की कोशिश कर रहे थे।

तभी एक कंधे पर पर्स लटकाए दूसरे हाथ में बढ़ा सा झाोला लिए उनके बेटे की बहू

अदिति ने प्रवेश किया और मुस्कुराते हुए अंदर चली गई। सुमित्रा देवी का पारा चढ़ गया। वो रामदयालजी की ओर देख बोलने लगी 'देखा आपने , कार चलाना और सूट पहनना क्या कम था , जो अब इसने सिर पर चुन्नी रखना भी बंद कर दिया।'

'अरे भाई देखा नहीं तुमने, कितना भारी झाोला था उसके हाथ में। नीलेश टूअर पर गया है घर-बाहर दोनों का काम संभालती है।' रामदयालजी ने बड़े इत्मिनान से कहा। ...

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