[udaipur] - मिलिए उदयपुर की मलाला से...किसी का खेत बिका तो किसी ने मवेशी चराकर जुटाई फीस...

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राकेश शर्मा राजदीप/उदयपुर . किसी ने पढ़ाई के लिए घरों में बर्तन मांजे, समाजजनों का विरोध हुआ तो कलक्टर से मदद मांगी...किसी के पिता ने गहने व खेत बेचे...दिन में पशु चराना और रात को चिमनी की रोशनी में पढ़ाई.. टीवी तो कभी देखी ही नहीं बस किताबों से इस कदर दोस्ती हुई कि अभाव को अपने संघर्ष से मात दी। ऐसे में कोई बनी गांव में दसवीं पास करने वाली पहली लडक़ी तो कोई आठ भाई-बहनों में अकेली शिक्षित। जज्बा ऐसा कि बारिश में भी नहीं रुकी। बीच में नाले में पानी बहा तो रस्से के सहारे आती-जाती। वक्त के साथ कदमताल नहीं छोड़ा, अब इनमें से कोई शिक्षिका बनी तो कोई अब प्रशासनिक अधिकारी और चिकित्सक बनने के लिए और पढ़ाई में जुटी हैं। ये आदिवासी अंचल की मलाला हैं, जो इन दिनों यहां उदयपुर में रहकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। पढ़ाई के लिए संघर्ष बताते हुए इनके आंसू टपक पड़े।भैंस चराने गई और चुपके से कलक्टर को किया फोन...

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