[shahdol] - पोते-पोतियों को किस्से सुनाने की उम्र हुई तो कर दिया घर से बाहर

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शहडोल. जैसे ही माता-पिता होने की जिम्मेदारी पूरी हो गई, वे अपनी संतानों के लिए बोझ बन गए। जब पोते-पोतियों को जीवन के अनुभव और किस्से सुनाने के दिन आए तो उस घर के कोने में उनके लिए कोई जगह ही नहीं थी। जिस घर को जीवनभर की तपस्या के साथ सजाया, उन्हें वहीं से बेगाना कर दिया गया। उम्र के आखिरी पड़ाव में सब सबसे अधिक सहारे की जरूरत थी, उसी समय उन्हें वहां से कूच करके वृद्धाश्रम को अपना ठिकाना बनाना पड़ा। वृद्धाश्रम में रहकर जीवन गुजर बसर करने वाले वृद्धों में से कुछ ऐसे है जिन्होंने माता-पिता का सिर से साया उठते ही सब कुछ छोड़ दिया। अब इनकी पूरी दुनियां वृद्धाश्रम में ही है। हालांकि मन में एक कसक भी है। इन सभी को अपनों से तो शिकवा नहीं लेकिन सरकार से जरूर शिकायत है। आज के दौर में भी इन्हें महज 300 रुपए ही वृद्धा पेंशन मिल रही है। इनका कहना है कि राशि बढ़ाने पर सरकार को विचार करना चाहिए।...

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