[uttarakhand] - उर्दू अकादमी के नाम पर राजनीति, 18 सालों से हो रहा है इंतजार

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उत्तराखंड में उर्दू अकादमी का कामकाज बीते कई सालों से ठप पड़ा है. प्रदेश बनने के 18 साल बीतने के बाद भी न तो उर्दू परवान चढ़ सकी और ना ही अकादमी अपने वजूद में आ पायी. नये अम्ब्रेला एक्ट के तहत सभी अकादमियों के एकीकरण के बाद भी इस पर कोई अमल होता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है.उत्तराखंड में भाषाओं से जुड़ी अकादमी अपना ही वजूद तलाशने में व्यस्त है. उर्दू अकादमी अब तक आई सभी सरकारों का एक मात्र शिगूफा ही रही है. इस अकादमी के पूरा नहीं होने के उर्दू, पंजाबी, गढ़वाली और कुमायूंनी भाषाओं को बढ़ावा कैसे मिलेगा, यहा सोचने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है. अकादमी नहीं बन पाने से इन भाषाओं के लेखकों और शायरों में भी निराशा बढ़ने लगी है.यह भी पढ़ें- कुछ साल पहले उत्तराखंड सरकार ने भाषाओं की तरक्की और साहित्यकारों की सहूलियतों देने के लिए अम्ब्रेला एक्ट के तहत सभी अकादमियों को एक छत के नीचे लाने का प्लान तैयार किया था. इसके बाद प्रदेश व देश के साहित्य और अदब से जुड़े लोगों को एक उम्मीद जगी थी कि सूबे में उर्दू, पंजाबी व दूसरी भाषाओं को नई पहचान मिल सकेगी.

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