[alwar] - शहीदों के परिजनों की पीड़ा आई सामने, जिन्होंने देश के लिए गंवाई जान, लेकिन परिवार के साथ हो रहा अन्याय

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अलवर. देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर शहीदों को शौर्य चक्र व सेना मैडल आदि सम्मान से तो नवाजा लेकिन उनके नाम पर स्कूलों के नामकरण का परिजनों को इंतजार है। यह स्थिति तो तब है जब सरकार खुद शहीदों के नाम पर गांवों के विद्यालयोंं के नामकरण का आदेश जारी कर चुके हैं। प्रकरण 1.

आदेश आते हैं और लौट जाते हैं

मेरे पति को शहीद हुए 13 साल हो गए हैं। आज तक मेरे गांव के स्कूल का नाम उनके नाम पर नहीं रखा जा सका है। यह कहना था फलियाबाद की ढाणी, पोस्ट नांगल की रहने वाली शशि बाला का। शहीदों के प्रति बेरूखी देख उनके परिवार ने गांव ही छोड़ दिया। उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में आंतककारियों के खिलाफ ऑपरेशन में पति सुबेदार हेमसिंह राजपूत शहीद हो गए थे। सेना ने उनको शौर्य चक्र से सम्मानित किया। स्कूल पर आज तक उनका नाम नहीं लिख पाया है। दो बार जिला प्रशासन और सैनिक कल्याण बोर्ड से आदेश आए कि गांव की स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखा जाए । गांव वाले विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि गांव में आठवीं तक का स्कूल है, दसवीं तक क्रमोन्नत के बाद ही स्कूल का नामकरण शहीद के नाम पर करने की बात कही जा रही है।

केस - 2

गांव वालों का विरोध नहीं सहना चाहती सरकार

पिछले 11 सालों से मैं इसी आस में हूं कि एक न एक दिन मेरे गांव के स्कूल का नाम मेरे पति के नाम पर होगा, जिससे आने वाली पीढिय़ों के लिए शहीदों की शहादत यादगार रहे। लेकिन गांव वाले ही इस काम में रोड़ा बने हुए हैं। जम्मू कश्मीर में बारामूला में पहलगांव में ऑपरेशन के दौरान 6 नवंबर 2007 को मेरे पति हुकम सिंह मीणा शहीद हुए थे। उनके शहीद होने पर सेना ने उनको सेना मैडल से सम्मानित भी किया था। उनकी शहादत अमर रहे इसलिए स्कूल का नाम उनके नाम पर होना चाहिए। गांव में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बांदका है। मैं चाहती हुं कि स्कूल का नाम मेरे पति के नाम पर हो लेकिन आज तक यह नहीं हो पाया है। सरकार के आदेश भी ग्रामीण नहीं मान रहे हैं।

बेटे को नहीं मिल रही छात्रवृत्ति

राज्य सरकार शहीदों के परिवारों को सुविधाएं और सुरक्षा दे रही है। लेकिन मेरे बेटे को आज तक छात्रवृृत्ति नहीं मिल पा रही है। मेरे साथ भाग दौड़ करने वाला कोई नहीं है। मेैं अकेले कहां- कहां जाऊं । यह कहना था तिजारा के बिलासपुर पोस्ट के गांव मलियार जटट की रहने वाली शहीद की पत्नी शर्मिला देवी का। उन्होंने बताया कि 17 अप्रेल 2004 को मेरे पति पप्पूराम शहीद हुए थे। पति को सेना की ओर से शौर्य चक्र भी दिया गया। उनके शहीद होते ही मेरी पेंशन शुरू हो गई। गांव के स्कूल का नाम भी उनके नाम पर रख दिया। मैंने मुश्किल से छात्रवृत्ति शुरु करवाई थी । लेकिन अचानक से बंद हो गई। इसका कोई कारण भी नहीं बताया।

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