[banswara] - विश्व में 550 साल पुरानी यह वस्तु लुप्त होने की कगार पर, राजस्थान के तीन युवा कर रहे नया जीवन देने का प्रयास

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विश्व में 550 साल पुरानी यह वस्तु लुप्त होने की कगार पर, राजस्थान के तीन युवा कर रहे नया जीवन देने का प्रयासऋग्वेद की शाख्यांयनी शाखा की पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशनबांसवाड़ा. पूरे विश्व में ऋग्वेद की शाख्यांयनी शाखा लुप्त होने के कगार पर है। इस शाखा के जानकारी भी मात्र दो ही बुजुर्ग बचे हैं और नई पीढ़ी इस शाखा के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ है। इसकी जानकारी कुछ युवाओं को मिली तो उन्होंने न केवल इस शाखा को बचाने की पहल की, बल्कि पाण्डुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक संसाधनों का उपयोग कर डिजिटलाइजेशन शुरू कर दिया है। करीब 60-65 हजार पन्नों में से 43 हजार पन्नों का अब तक डिजिटलाइजेशन हो चुका है।

आज से पारायणसंस्था के अनुसार हजारों साल पुराने ऋग्वेद को कागजों पर 1464 में उकेरा गया होगा। बांसवाड़ा में शाख्यांयनी शाखा के जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, वह करीब 1468 पुराने हैं। यह ग्रंथ करीब 550 साल से बांसवाड़ा में संरक्षित हैं। इसका पहली बार पारायण शनिवार से नागरवाड़ा के बड़ा रामद्वारा मेंहोगा। सात दिवसीय कार्यक्रम में देश से 10 वेद विशेषज्ञ शामिल होंगे।

चार साल से प्रयासवैदिक कार्यों से जुड़ी वैदिक भारत संस्था के युवाओं को जयपुर में कार्यरत एक चिकित्सक से वर्ष 2010 में जानकारी मिली कि लुप्तप्राय हो चुकी ऋग्वेद की शाख्यांयनी शाखा के दो जानकार बांसवाड़ा में पं. हर्षद नागर एवं हर्षवद्धन नागर हैं। उनके पास दुर्लभ पाण्डुलिपियां भी मौजूद हैं। इसके बाद संस्था के अभिजीत, मोहित भारद्वाज एवं राजेन्द्र बैंसला ने नवम्बर 2014 में इन बुजुर्गों से सम्पर्क किया। पांडुलिपियों का वीडियो बनाने के बाद इन्हें संरक्षित करने का कार्य शुरू किया गया। संस्था के वैदिक जानकार अभिमन्यु ने फरवरी 2015 में इनका अध्ययन शुरू किया। मोहित भारद्वाज बताते हैं कि दुर्लभ ग्रंथों का संरक्षण करने से इसका लाभ आने वाली पीढिय़ों को मिलेगा और इसका अध्ययन करने की चाह रखने वाले भी लाभ ले सकते हैं।

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