[kangra] - पौंग बांध विस्थापितों का मात्र मुरब्बा आवंटन मुद्दा नहीं: समिति

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विस्थापितों का मात्र मुरब्बा आवंटन मुद्दा नहीं : समितिपौंग बांध विस्थापितों की सभी समस्याओं पर हो चर्चा अमर उजाला ब्यूरो धर्मशाला। पौंग बांध विस्थापितों के मुद्दे पर 29 जून को हिमाचल और राजस्थान सरकारों के बीच हो रही उच्च स्तरीय वार्ता का पौंग-बांध संघर्ष समिति ने स्वागत किया है। समिति ने विश्वास जताया है कि हिमाचल सरकार और देहरा के विधायक होशियार सिंह की पहल पर हो रही वार्ता सफल होगी। संघर्ष समिति ने पांच दशकों में संपन्न हुई 23 उच्च स्तरीय वार्ताओं की असफलता का क्रम टूटने की भी आशा प्रकट की है। समिति के उपाध्यक्ष सत्येंद्र गौतम ने कहा कि पौंग बांध विस्थापितों का राजस्थान में मात्र मुरब्बा आवंटन ही मुद्दा नहीं है। यह पहली तरह का मामला है। दूसरी तरह के मामलों में हजारों ऐसे मामले हैं, जिसमें विस्थापितों को मुरब्बे तो अलॉट हुए लेकिन, वहां आधारभूत सुविधाओं का अभाव था। ऐसे में राजस्थानी लोगों का सहयोग लिया गया। इन लोगों ने विस्थापितों से धोखे और षड्यंत्र रचकर या राजस्व कर्मियों से मिलकर नकली मालिक बनाकर मुरब्बे हड़प लिए। हालांकि, ऐसा संभव नहीं था क्योंकि, समझौते के अनुसार 25 वर्ष से पहले मुरब्बों को बेचना या अग्रिम बेचने का समझौता नहीं किया जा सकता था। कई मामलों में कथित रूप में लोगों को मार दिया या भगा दिया गया। चौथी तरह के मामलों में मुरब्बे अलॉट भी हुए हैं। कागजों में काश्त और कब्जा भी विस्थापितों के नाम हैं लेकिन, मौके पर कब्जा राजस्थानियों का है, जिसे वे छोड़ते नहीं। पुलिस-प्रशासन और सरकार कोई सहायता नहीं करते। उल्टा राजस्थानियों का साथ दिया जाता है और विस्थापितों को प्रताड़ित किया जाता है। मामलों को कोर्ट-कचहरियों में उलझा कर इतना परेशान किया जाता है कि विस्थापित दौड़-दौड़ कर हौसला छोड़ देता है। समझौते के अनुसार श्रीगंगानगर जिले में विस्थापितों को भूमि देने का निर्णय हुआ था लेकिन, वर्तमान में विस्थापितों को अत्यंत दूरस्थ और सीमा पर स्थित मोहनगढ़ और रामगढ़ जैसे जिलों में जबरदस्ती मुरब्बे लेने को बाध्य किया जा रहा है। ये पांचवीं तरह के मामले हैं। उच्च स्तरीय बैठक में इन सभी मुद्दों पर विचार होना चाहिए।

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