[nagaur] - गार्ड बन गए 'बाबू', चोरों की मौज

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नागौर. बालवा रोड स्थित आवासीय योजना में इन दिनों चोरों का आतंक है। पहले झाडिय़ों की आड़ में दिन दहाड़े वारदातों को अंजाम देने वाले चोर अब झाडिय़ां कटने के बाद रात में आवंटियों की नींद * कर रहे हैं। आवासीय अभियंता कार्यालय में बतौर गार्ड नियुक्त कर्मचारी कॉलोनी में निगरानी के बजाय ऑफिस में बैठकर बाबूगिरी कर रहे हैं। कॉलोनी में पहरे के अभाव में आए दिन चोर सूने मकानों के ताले तोड़ लेते हैं तो कहीं निर्माणाधीन साइट पर रखे माल पर हाथ साफ कर जाते हैं। गुरुवार रात करीब दो बजे चोर न केवल लोहे के फाटक तोड़ ले गए, बल्कि जाग होने पर पास में सो रहे लोगों पर शराब की खाली बोतलें व पत्थर बरसाए।

22 में से 19 पद रिक्त आवासन मंडल कॉलोनी में तीन सुरक्षा गार्ड संविदा पर नियुक्त किए गए हैं, लेकिन तीनों सुरक्षाकर्मी गार्ड की ड्यूटी कम कार्यालय में बाबू की ड्यूटी ज्यादा करते हैं। कागजों में करीब एक दर्जन कर्मचारी नियुक्त हैं, लेकिन ऑफिस में तीन या चार कर्मचारी ही रहते हैं। आवासन मंडल नागौर कार्यालय में आवासीय अभियंता से लेकर कनिष्ठ सहायक तक 22 में से 19 पद रिक्त है। नागौर के आवासीय अभियंता केएस चौधरी के पास उप आवासन आयुक्त, जोधपुर का चार्ज है और वे अवकाश पर चल रहे हैं। एईएन पीके माथुर को कार्यवाहक आवासीय अभियंता का चार्ज दिया गया है। आखिर किसे बताएं पीड़ा कार्यालय में स्टॉफ की स्थिति को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार आवासन मंडल के कामकाज को लेकर कितनी गंभीर है। एईएन के पांच पद रिक्त है और जोधपुर कार्यालय के एईएन को अतिरिक्त कार्य भार दिया गया है। इसके अलावा सहायक लेखाधिकारी द्वितीय का एक, कार्यालय अधीक्षक का एक, कनिष्ठ लेखाधिकारी के पांच, कार्यालय सहायक के तीन व कनिष्ठ सहायक के छह पद लम्बे समय से रिक्त हैं। अधिकारियों के अभाव में आवंटियों को कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कॉलोनी में चोरी की वारदात के संबंध में कार्यवाहक आवासीय अभियंता पी.के माथुर ने कोतवाली में रिपोर्ट दी है।

फिर कैसे होगी मॉनीटरिंग पिछले ढाई साल से बंद पड़ा काम शुरू करने की अनुमति तो सरकार ने दे दी, लेकिन कार्य की मॉनीटरिंग व गुणवत्ता का ध्यान रखने की शर्त भी जोड़ दी। कार्यालय में स्टॉफ की कमी पूरी करने को लेकर विभागीय अधिकारियों को कई बार पत्र लिखने के बावजूद आवासन मंडल स्टॉफ की नियुक्ति नहीं कर रहा है, ऐसे में गुण्वत्ता से काम करवाने की सरकार की नियत में खोट साफ नजर आ रहा है। ऑफिस में अधिकारी या कर्मचारी नहीं होने से आवंटियों की समस्या का समाधान तो दूर उनकी पीड़ा सुनने के लिए जिम्मेदार कुर्सी पर नहीं मिलते।

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