[sikar] - यहां निजी अस्पतालों व जांच केन्द्रों पर मरीजों से की जा रही मनमर्जी की वसूली

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सीकर. जिले में संचालित निजी अस्पताल संचालक और जांच केन्द्रों पर मरीजों से मनमर्जी की वसूली की जा रही है। किस अस्पतालों में मरीज से उपचार या जांच के लिए फीस कम है या ज्यादा ली जा रही है। वहां जांच प्रशिक्षित कार्मिक कर रहे हैं या नहीं। इनकी जानकारी चिकित्सा विभाग तक को नहीं है। खास बात ये है कि मरीजों की जेब काटने का ये सिलसिला क्लिीनिकल एस्टीबलिशमेंट एक्ट के नोटिफिकेशन के तीन वर्ष से चल रहा है। नोटिफिकेशन के बाद एक्ट को लागू करने के लिए कमेटी तो बना दी लेकिन लेकिन कमेटी की नियमित बैठक नहीं हो रही है। हालांकि चिकित्सा विभाग ने इस एक्ट की पालना के लिए कमेटी की नियमित और शीघ्र ही अस्पताल व जांच केन्द्रों की जांच करवाने का दावा किया है।

नहीं हो पाती है कार्रवाई जिले में सैंकडों की संख्या में खुले इन जांच केन्द्रों व अस्पतालों में मल-मूत्र,खून, डायबिटीज, थाइराइड, डेंगू,मलेरिया, सीटी स्कैन, एमआरई सरीखी महत्वपूर्ण जांच होती है। अक्सर कई मामलों में निजी अस्पताल व चिकित्सा विभाग के आंकडों में अंतर आता है। क्लिीनिकल एस्टेबलिशमेंट एक्ट के अधीन नहीं होने से चिकित्सा विभाग इन पर कार्रवाई नहीं कर पाता है।जांच केन्द्र और नर्सिंग होम खोलने के लिए केवल डिप्लोमा ही आधार माना जाता है। डिप्लोमा धारक कहीं भी अस्पताल या जांच केन्द्र खोल सकता है। चिकित्सा विभाग के अनुसार एक्ट की सही तरीके से पालना हो इन केन्द्रों को मरीज को बेहतर सेवाएं देनी होगी। नहीं तो विभागीय कार्रवाई होने पर बंद होने तक का संकट आ सकता है।

ये है एक्टक्लिीनिकल एस्टीबलिशमेंट एक्ट का पांच जून 2014 मेंनोटिफिकेशन हुआ था। एक्ट के अनुसार सरकारी, निजी व लेबोरेट्रीको लाइसेंस लेना अनिवार्य है। लाइसेंसधारक को अपने प्रतिष्ठान में जांच की दर व फीस, कार्मिकों की शिक्षा व देय सुविधाओं का ब्यौरा अंकित करना होगा। अंकित ब्यौरे से अधिक शुल्क लेने पर चिकित्सा विभाग में शिकायत की जा सकती है। एक्ट की पालना के लिए जिला कलक्टर, सीएमएचओ, स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधि व इंडियन मेडिकल कांउसिल के सदस्य जिम्मेदार हैं। ये सदस्य व्यक्तिश जांच कर कर सुविधाओं की जानकारी लेकर कार्रवाई करेंगे।

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