[kanpur] - मेरी आपबीतीः 'मैं डरी नहीं और मुसीबतों को दे दिया तलाक'

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'मेरी शादी वर्ष-2010 में हुई थी। शुरुआती पांच साल पति और ससुरालियों के साथ काफी हंसी-खुशी से बीते। न पति को और न ही उनके घरवालों को मुझसे कोई दिक्कत थी। लेकिन, अचानक हालात बदलने लगे। एक दिन की बात है पति के दोस्तों के साथ हम सब बैठे थे। बातों-बातों में पति ने सबके सामने कह दिया कि हमने तो कभी दहेज मांगा नहीं और इसके पिता ने अपने मन से कुछ दिया भी नहीं। हंसी-हंसी में कही गई इस बात को मैं मजाक समझकर टाल बैठी। लेकिन वह मजाक नहीं, भविष्य की परेशानियों की शुरुआत थी। इसके बाद ससुराल वाले छोटी-छोटी बातों पर दहेज न मिलने को लेकर ताने मारने लगे। हद तो तब हो गई, जब वो मुझ पर पिता से पैसे मांगने के लिए दबाव डालने लगे। मुझसे मारपीट शुरू कर दी। सास-ससुर ने भी पति का साथ दिया। घर में पिता परेशान होंगे, इसलिए मैंने कोई भी बात उन्हें नहीं बताई। धीरे-धीरे पति ने मेरा घर से निकलना भी बंद करा दिया और नौकरों को हटाकर मुझसे ही सारे काम करवाने लगे। जब सहने की शक्ति खत्म हो गई, तो मैंने अपनी एक सहेली की मदद से वकील से संपर्क किया। वकील की सलाह पर पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने ससुरालियों से पूछताछ की। इससे सभी डर गए और ऐसा न करने की कसमें पुलिस के आगे खाने लगे। लेकिन, मैंने उनकी बातों पर भरोसा नहीं किया और सबको छोड़ कर अपने पिता के घर रहने लगी। अब मैंने अपनी पति को तलाक दे दिया है। आज एक बड़ी कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रही हूं। देश ही नहीं, बल्कि विदेश का भी दौरा करती हूं। आज सोचती हूं कि अगर उस वक्त मैंने अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाई होती तो मेरा जीवन ही नरक हो जाता।'

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