[lucknow] - दरगाह शरीफ का मुख्य मेला आज

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बहराइच। सैयद सालार मसऊद गाजी की दरगाह पर मुख्य मेला रविवार को है। इसकी तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। मेले में गाजे-बाजे के साथ विभिन्न जनपदों व प्रांतों से परंपरागत बारातें आएंगी।टांडा, बस्ती, जौनपुर, नासिक व रुदौली की बारातें आकर्षण का केंद्र रहेंगी। मुख्य मेले में शामिल होने के लिए अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ रहा है। जियारत का सिलसिला जारी है। सैयद सालार मसऊद गाजी की दरगाह पर जेठ मेला तीन मई को ही शुरू हो गया था। लेकिन जेठ माह का पहला रविवार मेले का मुख्य दिन होता है। यह मुख्य दिन छह मई को है। इसकी तैयारियां पूरी करने का दावा दरगाह प्रशासन कर रहा है।दरगाह प्रबंध समिति के अध्यक्ष शमशाद अहमद ने बताया कि मुख्य जेठ मेला में रविवार को एक हजार वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जाएगा।पूर्वांचल, नेपाल, मुंबई, दिल्ली, राजस्थान, बिहार से बाराती दरगाह शरीफ पहुंच चुके हैं। रविवार शाम 7 बजे बारातें गाजे-बाजे के साथ डेरों से गाजी की दरगाह के लिए रवाना होंगी।बारातियों का स्वागत दरगाह प्रबंध समिति के साथ जिला प्रशासन के आला अधिकारी भी करेंगे। इन बारातियों के हाथों में निशान, चादर, पलंगपीढ़ी व दहेज का पूरा सामान होगा।बारातें जंजीरी गेट से प्रवेश कर नाल दरवाजा होते हुए गाजी की दरगाह पर हाजिरी लगाएंगी। वहां पर पलंगपीढ़ी व दहेज का सामान रखा जाएगा।ये है मान्यता, 250 बारातें हैं पंजीकृतमान्यता है कि रुदौली, बाराबंकी की रहने वाली जोहराबीबी एक हजार साल पूर्व दुल्हन बनी थीं। उन्हीं की याद में यह बारातें गाजी की दरगाह तक आती हैं।मुख्य बारात टांडा, बस्ती, जौनपुर, नासिक व रुदौली (बाराबंकी) की होती है। दरगाह प्रबंध समिति के अध्यक्ष शमशाद का कहना है कि 250 बारातें पंजीकृत हैं।लेकिन प्रति वर्ष बारातों को लाने का सिलसिला बढ़ रहा है। ऐसे में लगभग पांच सौ बारातें देश के विभिन्न हिस्सों से बहराइच पहुंचने की उम्मीद लगाई जा रही है।इस बारात में न दूल्हा होगा न दुल्हन लेकिन परंपरा निर्वहन में रस्म की अदायगी बिल्कुल वैवाहिक समारोह की तरह होगी। उपवास रखते हैं बारातीरविवार को बारात में शामिल होने वाले बाराती पूरे दिन उपवास रखेंगे। अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। बारात की रस्म अदायगी के बाद ही सभी भोजन करेंगे।गाजी को सलाम कर निभाते परंपरासैयद सालार मसऊद गाजी की दरगाह पर बारातें तो सैकड़ों की संख्या में आती हैं। लेकिन मुंबई से आने वाले किन्नरों का समूह जो बारात लेकर आता है।उसकी छटा अलग ही होती है। ढोलक व मंजीरे की थाप पर थिरकते हुए बाराती किन्नर गाजी की मजार पहुंचकर सलाम करते हुए परंपरा का निर्वहन करते हैं।

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