*आज सोमवार है, द्वादस ज्योतिर्लिगों में एक त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा बताते हैं!*

त्रयम्बकेश्वर एक प्राचीन हिन्दू मंदिर है जो भारत के महाराष्ट्र के नासिक जिले की त्रयम्बकेश्वर तहसील के त्रिम्बक शहर में स्थित है। ये मंदिर नासिक शहर से 28km और नासिक रोड से 40km की दुरी पर स्थित है। त्रयम्बकेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ये मंदिर शिव जी के उन 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है जिन्हे भारत में सबसे पवित्र और वास्तविक माना जाता है। मंदिर परिसर में एक कुंड है, कुशावर्त जो गोदावरी नदी, भारत की सबसे लम्बी नदी, का एक स्त्रोत्र है। वर्तमान मंदिर का निर्माण पेशवा बालाजी बजी राव (नानासाहेब) ने करवाया था। शिवपुराण के अनुसार, ब्रह्मगिरि पर्वत के शीर्ष तक पहुंचने के लिए सात सौ चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इन सीढ़ियों पर चढ़ने के उपरांत ‘रामकुण्ड’ और ‘लष्मणकुण्ड’ मिलते हैं और शिखर के ऊपर पहुँचने पर गोमुख से निकलती हुई भगवती गोदावरी के दर्शन प्राप्त होते हैं। ज्योतिर्लिंग : शिव महापुराण के मुताबिक, एक बार ब्रह्मा (सृष्टि के हिंदू देवता) और विष्णु (मुक्ति के हिन्दू देवता) के मध्य सृष्टि के वर्चस्व को लेकर एक विवाद हो गया। उनकी परीक्षा लेने के लिए, शिव जी ने एक विशाल अंतहीन प्रकाश स्तम्भ, ज्योतिर्लिंग को सृष्टि के तीनो लोको से पार कर दिया।

ब्रह्मा और विष्णु दोनों अपने अपने मार्ग चुनकर इस प्रकाश के अंत को खोजने के लिए ऊपर और नीचे की ओर चल दिए। ब्रह्मा ने झूठ कहा की उन्हें प्रकाश का अंत मिल गया जबकि विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली। उसके पश्चात शिव जी एक दूसरे प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा को श्राप दिया की तुम्हे किसी भी समारोह में स्थान नहीं मिलेगा जबकि विष्णु अनंतकाल तक पूजे जायेंगे। ज्योतिर्लिंग एक महान वास्तविकता है जिसमे से शिव जी आंशिक रूप से प्रकट होते है। तब से ये माना जाता है की ज्योतिर्लिंग मंदिर वे स्थान है जहां से शिव जी प्रकाश के एक तेजस्वी स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। मूल रूप से शिव जी के 64 ज्योतिर्लिंग है जिनमे से 12 को बहुत शुभ और पवित्र माना जाता है। इन बारह ज्योतिर्लिंग में प्रत्येक का नाम इनके इष्ट देव पर रखा गया है जो शिव के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन करते है। इन सभी स्थलों पर, मुख्य छवि शिवलिंग की है जो अनादि और अनन्त के प्रकाश स्तंभ को दर्शाती है और शिव जी की अनंत प्रकृति का वर्णन करती है। इन बारह ज्योतिर्लिंगों में गुजरात के सोमनाथ, आंध्र प्रदेश के श्रीसैलम में स्थित मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर, मध्य प्रदेश के ओम्कारेश्वर, हिमालय के केदारनाथ, महारष्ट्र के भीमाशंकर, उत्तर प्रदेश की वाराणसी में स्थित विश्वनाथ, महाराष्ट्र के त्रयम्बकेश्वर, वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, देवघर में देवगढ़, झारखण्ड, गुजरात के द्वारका में स्थित नागेश्वर, तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित रामेश्वर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित गृष्णेश्वर शामिल है। इसका निर्माण शुद्ध पत्थरो से किया गया है और मंदिर के भीतर भगवान शिव विराजमान है। ये मंदिर महाराष्ट्र के नासिक में स्थित है। पौराणिक इतिहास : त्रयम्बकेश्वर एक धर्मिक केंद्र है जो शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस ज्योतिर्लिंग की सबसे असाधारण विशेषता ये है की इसके तीन मुख्य है एक भगवान् ब्रह्मा, एक भगवान् विष्णु और एक भगवान् रूद्र।

पानी के ज्यादा उपयोग के कारण ये शिवलिंग नष्ट होने लगा है। कहा जाता है ये नष्टता मानव समाज की बदलती प्रकृति का प्रतीक है। इस लिंग के चारो ओर एक रत्नजड़ित मुकुट रखा गया है जिसे त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के सोने के मुखोटे के ऊपर रखा गया है। कहा जाता है इस मुकुट को पांडवो के समय से है जिसमे हीरे, पन्ने और कई कीमती रत्न जड़े गए है। इस मुकुट को केवल सोमवार के दिन 4 से 5 pm बजे तक दिखाया जाता है। ये मंदिर ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित है। ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी तीन स्रोतों द्वारा निकलती है। विशेषता : त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों ही एक साथ विराजमान हैं जो यहाँ की सबसे अनोखी और असामान्य विशेषता है। क्योकि अन्य सभी ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव ही विराजमान है। निर्माण : गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रिमबकेश्वर मंदिर का निर्माण काले पत्थरो से किया गया है। मंदिर की वास्तुकला बहुत की आकर्षक है। इस मंदिर के पंचक्रोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि आदि की पूजाएं कराइ जाती है। जिनका आयोजन भक्तगण अलग-अलग मनोकामनाओं को पूर्ण करवाने के लिए करवाते हैं। इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था जिसका अंत 31 साल के बाद सं 1786 में सम्पूर्ण हुआ।

तथ्यों के मुताबिक इस भव्य प्राचीन मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे, जिसे उस समय काफी बड़ी रकम माना जाता था। मंदिर : कुछ दूर पैदल यात्रा करने के पश्चात मंदिर का मुख्य द्वार नजर आने लगता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर की भव्य इमारत सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के भीतर एक गर्भगृह है जिसमे प्रवेश करने के पश्चात शिवलिंग की केवल आर्घा दिखाई देती है, लिंग नहीं। यदि ध्यान से देखा जाए तो आर्घा के भीतर एक-एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन लिंगों को त्रिदेव- ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। प्रातः काल में होने वाली पूजा के बाद इस आर्घा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है। दंतकथाओं के मुताबिक त्रिम्बक गौतम ऋषि की तपोभूमि हुआ करती थी। उनके ऊपर लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गौतम ऋषि ने शिव जी का कठोर तप किया और उनसे ये वरदान माँगा की वे यहाँ गंगा अवतरित कर दे।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी को यहाँ अवतरित कर दिया। गोदावरी के आने के साथ ही गौतम ऋषि द्वारा प्रार्थना करने के बाद शिवजी ने इस मंदिर में विराजमान होना स्वीकार कर लिया। क्योकि शिव को त्रिनेत्र भी कहा जाता है उनके यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्रिम्बक (तीन नेत्रों वाले) के नाम से जाना जाने लगा। उज्जैन और ओंकारेश्वर की ही भांति त्र्यंबकेश्वर महाराज को भी इस गाँव का राजा माना जाता है, इसलिए हर सोमवार को त्रयम्बकेश्वर के राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस भ्रमण के दौरान त्रयम्बकेश्वर महाराज के पंचमुखी सोने के मुखौटे को पालकी में बैठाकर गाँव में घुमाया जाता है। फिर कुशावर्त तीर्थ स्थित घाट पर स्नान कराया जाता है। इसके बाद मुखौटे को वापस मंदिर में लाकर हीरेजड़ित स्वर्ण मुकुट पहना दिया जाता है। कहा जाता हैं ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाया करती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा पानी रहता है। इसी कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़े इसी कुंड में शाही स्नान करते हैं।

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