[unnao] - सरकारी से तौबा, पैसा खर्च कर लगवा रहे एआरवी

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उन्नाव। जिला अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही कुत्तों व बंदरों का शिकार हुए लोगों की जिंदगी खतरे में डाल रही है। अस्पताल में डाक्टर एआरवी की वैक्सीन लगाने के बाद मरीज को अगली वैक्सीन का जो समय दे रहे,उसमें अधिकतर लोगों को वैक्सीन नहीं लग रही। इससे मरीज आए दिन हंगामा करते हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। ऐसे में लोगों ने जिला अस्पताल से किनारा शुरू कर दिया है। कुत्तों व बंदरों का शिकार हुए लोग पांच सौ से एक हजार रुपये तक खर्च कर अस्पताल से बाहर एआरवी (एंटी रैबीज इंजेक्शन)लगवा रहे हैं।

जिला अस्पताल में एंटी रैबीज की वैक्सीन का टोटा रहता है। वैक्सीन का प्रयोग सही तरीके से हो, इसके लिए काउंसलर की नियुक्ति की गई है। काउंसलर को उन्हीं मरीजों को वैक्सीन लगवाने के लिए कहा गया, जिन्हें वास्तव में जरूरत है। अस्पताल में ऐसा नहीं हो पा रहा। काउंसलर कोरम पूरा करते हुए हर एक व्यक्ति को वैक्सीन लगवाने की सलाह देते हैं। इनमें वह लोग भी शामिल होते, जिन्हें सिर्फ जानवरों के नाखून ही लगते हैं। ऐसे में वैक्सीन का स्टाक समय से पहले ही खत्म हो जाता है। तय समय पर वैक्सीन लगवाने के लिए पहुंचने वालों को टरका दिया जाता है। वैक्सीन न लगने से लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ रही है। मंगलवार को जिला अस्पताल पहुंचे आदर्श नगर निवासी अनुज ने बताया कि उन्हें सोमवार को वैक्सीन लगनी थी, वैक्सीन खत्म होने की बात कहकर उन्हें घर भेज दिया गया था। अनुज ने बताया कि उन्होंने निजी चिकित्सक के यहां वैक्सीन लगवाई।

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जानवर की लार से होती है रैबीज

कुत्ता, बंदर, सूअर आदि के काटने पर इनकी लार व्यक्ति के खून में मिल जाती है। तब रैबीज का खतरा रहता है। रैबीज मानसिक संतुलन को खराब कर देता है।

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तीन या पांच लगते हैं इंजेक्शन

डाश़ुमान तिवारी ने बताया कि कुत्ते के काटने पर उपचार में तीन या पांच इंजेक्शन लगाए जाते हैं। उपचार में एंटी रैबीज वैक्सीन की डोज दी जाती है। डाक्टर घाव को देखकर तीन या पांच डोज लगवाने की सलाह देते हैं। वैक्सीन लगवाने में चार-चार दिन का अंतर रखा जाता है। इस बीच वैक्सीन नहीं लगती है तो पूर्व में लगी वैक्सीन का असर खत्म हो जाता है।

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