[varanasi] - तप-ताप की ठांव, निकले नंगे पांव

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वाराणसी। चिलचिलाती धूप, गर्म हवा के थपेड़े। सड़कें ऊबड़-खाबड़। तपती राह के बावजूद नंगे पांव निकले पंचक्रोशी तीर्थयात्रियों की आस्था जितनी पावन, हौसला भी उतना ही अनूठा। मणिकर्णिका तीर्थ से संकल्प लेकर पंचक्रोशी परिक्रमा पर निकले आस्थावानों ने पहले पड़ाव पर पहुंचने के बाद पौराणिक कंदवा तालाब में स्नान किया और फिर कर्दमेश्वर महादेव का दर्शन कर पुण्य-फल के साथ देवऋण से मुक्ति पाई।यहां कर्दमेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन से देवऋण से मुक्ति की मान्यता उतनी ही पुरानी है, जितना कि पंचक्रोशी तीर्थ। पुराणों में वर्णित है कि भगवान श्रीराम, रावण वध के बाद जब अयोध्या पहुंचे तो गुरु वशिष्ठ की आज्ञा पर ब्रह्महत्या से मुक्ति के लिए सपरिवार खुद यह परिक्रमा की थी। तब से इस परिक्रमा की परंपरा चली आ रही है। बुधवार की तड़के से मणिकर्णिका तीर्थ से रवानगी के बाद बिना रुके, बिना थके तीर्थयात्रियों के जत्थे बारी-बारी पहले पड़ाव पर पहुंचते रहे। स्नान-पूजन के बाद उन्होंने धर्मशालाओं में पड़ाव डाला। फलाहार ग्रहण किया और फिर धर्मशालाओं में पूजा-पाठ के साथ भक्तिधारा प्रवाहित हो उठी। शाम से ही तीर्थयात्रियों के कई जत्थे दूसरे पड़ाव भीमचंडी के लिए रवाना होने लगे। रवानगी से पहले उन्होंने कर्दमेश्वर महादेव से ‘कर्दमेश्वर देवेसा, काशीवास जनप्रिय:, आज्ञा देहि महादेव:। पुर्नदर्श नमोस्तुते...’ की स्तुति के साथ आज्ञा ली। पंडित रमेश प्रसाद मिश्र बताते हैं कि कर्दम ऋषि और इक्ष्वांकु वंश की देवहुति की तपोस्थली कंदवा की अपनी अलग महत्ता है। भगवान कर्दमेश्वर के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं को देवऋण से मुक्ति मिल जाती है।

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