[kullu] - चंद्र घाटी में भारी बर्फबारी के बीच मनाया हालडा

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भारी हिमपात-बर्फीली हवाओं के बीच मनाया हालड़ा

चंद्र घाटी में बिजली गुल होने से मोमबत्ती जलाकर निभाई पारंपरिक रस्म

हिमस्खलन के डर से कई लोगों ने घर के आंगन जलाईं मशालें

कोकसर (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय क्षेत्र लाहौल में भारी बर्फबारी और बर्फीली हवाओं के बीच पारंपरिक हालड़ा उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। चंद्रा घाटी की चार पंचायतों में नए साल के त्योहार हालड़ा की धूम रही।

मौसम की बेरुखी के चलते मंगलवार की रातें अंधेरे में ही कटी और ग्रामीणों को मोमबत्ती जलाकर देवी-देवताओं और पुण्य आत्माओं को समर्पित हालड़ा उत्सव मनाना पड़ा। चंद्रा घाटी के तेलिंग व तोदचे में रात को बर्फीली हवाओं के बीच लोगों ने मशालें लेकर जगह-जगह इकट्ठे होकर निश्चित स्थान पर बुरी शक्तियों को भगाया। कई स्थानों पर हिमखंड और हिमस्खलन की संभावना को देखते हुए अपने घरों के आंगन में ही हालड़ा की मशाल को जलाया। बर्फ से लकदक संपूर्ण घाटी मशालों की रोशनी से जगमगा उठी और एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई दी। तोद, गाहर और पट्टन के बाद इस बार तिनन घाटी का हालड़ा और लम्होई 22 जनवरी को मनाया गया। लाहौल की प्रत्येक घाटी की भौगोलिक परिस्थिति ओर प्रतिकूल जलवायु के कारण अलग-अलग तिथि ओर विधि से मनाया जाता है। पट्टन घाटी में हालड़ा उत्सव हर वर्ष सर्दियों में चंद्रमास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। मान्यता अनुसार घाटी में सर्दियों के दौरान देवता स्वर्ग के प्रवास पर चले जाते हैं तथा राक्षसों तथा आसुरी शक्तियों का बोलबाला अधिक रहता है। इन्हीं आसुरी शक्तियों और बुरी आत्माओं से निजात पाने के लिए मशाल उत्सव का आयोजन किया जाता है। राजा घेपन कमेटी के प्रधान पूर्ण चंद ने बताया कि हालड़ा के प्रकार में सद हालड़ा निकाला जाता है और बाद में नाना प्रकार के पकवान थाली में सजा कर आग के अलाव में श्रद्धा पूर्वक अर्पित किए जाते है।

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