जीवन में राग-द्वेष का रहना, जीवन-मरण का चक्र चलना

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रतलाम। किसी के यहां पेड़ लगा हो और वो हटाना चाहता हो तो वो क्या करेगा, ऊपर ऊपर से डालिया और तना काटेगा या जड़ से पेड़ काटेगा। बीज को जलाने के बाद वो अंकुरित नहीं होता है। तेरे जनम मरण का मूल कारण भी लगभग यही है। राग या मोह को जड़ से नहीं काटोगे और द्वेष को पूरी तरह से जलाकर ख़त्म नहीं करोगे, अगर राग और द्वेष का एक अंश भी बाकि रह जाता है तो जीवन मरण का चक्र चलता रहता है।

अनुराग जब तक मन में रहेगा तब तक उलझना

यह विचार चातुर्मासिक नीमचौक स्थानक पर आयोजित सुबह धर्मसभा में प्रियदर्शनश्री महाराज ने व्यक्त किए। महाराज ने कहा कि राग अपने विचारों से भी हो सकता है, किसी से जुड़े रहना जैसे मेरी मम्मी, मेरा बेटा ये अनुराग जब तक मन में रहेगा, तब तक जीवन मरण के चक्कर में उलझना ही होगा। संघ प्रतिनिधी ने बताया की 15 अक्टूबर से गुरुदेव उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन करेंगे और प्रभु महावीर के जीवन का उनके गुणों का संगीतमय प्रवचन प्रदान करेंगे। जहां मोह है वहां राग है और जहाँ राग है वंहा मोह है । वीतरागी बनने के लिए मोह को राग को कम करना होगा।...

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