राम कथा जीवन के सारे संशय और भ्रम को दूर करती है

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ग्वालियर। भगवान श्रीराम जब वनवास को निकले तो भैया भरत बड़ी सेना लेकर चित्रकूट पहुंचे। भरतजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि आप अयोध्या लौट चलो मैं वन को चला जाता हूं। रामजी ने कहा पिता के वचनों का आदर करो हम 14 वर्ष के बाद में अयोध्या लौट आएंगे। प्रभु श्रीराम ने भरतजी के पांव के छाले देखे तो उन्होंने अपनी पावड़ी भरत जी को दे दी और भरत जी ने वह पावड़ी पहनने के बदले प्रसाद बाटकर सिर पर रख लिया। उन्होंने अयोध्या लौटकर राज गद्दी पर प्रभुराम की पावंड़ी रख दी और वह भी राज महल छोड़कर कुटिया में रहने चले गए। चित्रकूट में जहां श्रीराम, भरत से मिले हैं वहां आज भी प्रभु श्रीराम के चरणों के निशान बने है। राम कथा जीवन के सारे संशय और भ्रम को दूर करती है। यह विचार कथा वाचक पूज्य संत आचार्य शान्तनु महाराज ने आज समापन कव सातवें दिन बुधवार को श्रीराम कथा आयोजन समिति दीनदयाल नगर की ओर से बी-ब्लाॅक महाराज काॅम्पलेक्स के पीछे पार्क में आयोजित श्रीराम कथामृत के संत्सग मे कही।...

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