आखिरी गांवों में इंतजार की इंतिहा...रोशनी के इंतजार में एक और दीपावली

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गडरारोड (बाड़मेर ). 1998 से अब तक 21 दीपावली चली गई यह सुनते-सुनते कि गांव में बिजली आएगी लेकिन आज भी हम तो अंधेरे में जी रहे है। हमारे जीते-जी लगता है उजाला नसीब ही नहीं होगा। इस दीपावली भी हम तो चिमनी जलाएंगे। हमारे बच्चों को पढऩे में तकलीफ होती है।

लालटेन की रोशनी में आंखे दुखती है। शाम 7 बजे बाद धुप्प अंधेरा नसीब हो गया है। सुबह 6 बजे से पहले रोशनी नसीब ही नहीं है। यहां 50 डिग्री तक तापमान चला जाता है और बिजली नहीं है तो पंखा भी नसीब नहीं है। आजादी के 74 साल बाद भी हम अंधेरे से आजाद नहीं हुए है। यह दर्द बयां करते है सीमावर्ती गांव रतरेड़ी कला के भारताराम।...

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