बीमा कम्पनी क्लेम पास करने में कर रही थी आनाकानी, फोरन को करना पड़ा हस्तक्षेप

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मंदसौर. स्वास्थ्य बीमा कराने के बाद भी पीडि़त को उसकी बीमा राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा था। इस पर पीडि़त ने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। फोरम ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद स्टॉर हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी से पीडि़त पक्ष को उपचार की राशि दिलाई।

स्टॉर हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी चैन्नई की रतलाम शाखा से वर्ष 2010 में अभिकर्ता मंगला पालीवाल निवासी मंदसौर से सीके जैन, पत्नी मंगला जैन व पुत्री का 3 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस कराया था। इस हेल्थ इंश्योरेंस की प्रीमियम राशि 15 हजार रुपए प्रतिवर्ष भर रहे थे। उपभोक्ता सीके जैन ने बताया कि पत्नी मंगला जैन का स्वास्थ ठीक नहीं होने पर उन्होंने निजी चिकित्सक से उपचार कराया था। इलाज पर करीब 11 हजार 130 रुपए का खर्च आया था। राशि के भुगतान के लिए बीमा कम्पनी से सम्पर्क किया। बीमा कम्पनी ने राशि के भुगतान से मना कर दिया। तब उपभोक्ता फोरम मंदसौर में अधिवक्ता संदीप भार्गव के माध्यम से वाद दायर किया। बीमा कम्पनी ने आपत्तियां दर्ज कराई। यहां तक कि बीमा कम्पनी ने जैन का दावा भी निरस्त कर दिया। उपभोक्ता फोरम के विद्वान न्यायमूर्ति रमेश मावी के सम्मुख बीमा कम्पनी ने झूठा व्यक्तव्य प्रस्तुत कर यहां तक कह दिया कि दावे की राशि का भुगतान कर दिया गया है। भुगतान के प्रमाण मांगे तो बीमा कम्पनी प्रमाण नहीं दे सकी। उपभोक्ता फोरम के न्यायाधीश ने सभी तर्कों को सुनकर परिवादी मंगला जैन के पक्ष में फैसला सुनाया। परिवादी को बीमा कम्पनी 11 हजार 130 रुपए दावे की राशि, आर्थिक नुकसानी की राशि 5 हजार रुपए, व्यय के तौर पर एक हजार रुपए तथा दावे की राशि 7 प्रतिशत वार्षिक दर से भुगतान के आदेश दिए।

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