संसार के चक्रव्यूह से लौटना भी आना चाहिए: कथाचार्य

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छतरपुर. भगवान के प्रभाव और स्वभाव पर श्रीराम किंकर विचार मिशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मैथिलीशरण भाई ने चौथे दिन की रामकथा सुनाते हुए कहा कि प्रवृत्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण निवृत्ति होती है। संसार में प्रवृत्ति करना तो ठीक है पर उससे निवृत्ति करना भी आना चाहिए। रामायण में युवराज अंगद यही शंका व्यक्त करते हैं कि वह लंका पहुंच तो जाएंगे पर लौटना संदिग्ध है। महाभारत में भी अभिमन्यु की यही समस्या है कि वह द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह में भेद तो कर सकते हैं पर वापिस लौटना नहीं जानते। भाईजी ने कहा कि संसार के चक्रव्यूह से लौट आना भी सीख लीजिए जो हनुमान जी जैसे भक्त को अच्छे से आता है। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि किसी भी वाहन का काम आगे ले जाना है पर उसमें ब्रेक और बैक गियर इसीलिए स्थापित किया गया है कि जब जरूरत हो तो रुकना और वापिस होना भी आना चाहिए। आज सभी मां बाप अपने बच्चों को संसार में प्रवृत्त कराना तो सिखा रहे हैं पर निवृत्ति का कोई ज्ञान नहीं दे रहे हैं। सत्संग ही ऐसा माध्यम है जो चरित्र निर्माण कराता है। उन्होंने कहा कि सद् के साथ रहने से भगवान का साथ मिलता है। उन्होंने कहा कि श्राप और वरदान दोनों ही लाभकारी और नुकसानदायक हो सकते हैं। हनुमान जी अपनी शक्ति को भूले रहने के श्राप का लाभ यह उठाते हैं कि उन्हें अपना बल और प्रभाव कभी याद नहीं रहता। वह जब भी प्रभाव बताते हैं तो भगवान का बताते हैं और उधर होलिका अपने वरदान की ताकत का दुरुपयोग कर भक्त प्रहलाद को जला देना चाहती है।...

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