134 साल की मुकदमेबाजी के बाद नई सुबह की उम्मीद में रामनगरी, अब फैसले पर टिकी निगाहें

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दीपोत्सव से पहले रामनगरी में सुबह से ही नया उत्साह और उमंग दिखी। 1885 में जिला अदालत में शुरू हुआ मुकदमा बुधवार को शीर्ष न्यायालय में परिणति पर पहुंचा। अब फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं। हिंदू-मुस्लिम पक्षकार ही नहीं, यहां के कारोबारी, नौकरीपेशा और दूर देश में रहने वाले लोग भी गदगद नजर आए। सभी की जुबान पर यही था कि अब अयोध्या में अमन-चैन होगा, विकास होगा और हर तरह का संशय समाप्त हो जाएगा।

अयोध्या विवाद की कहानी काफी लंबी है। दस्तावेज बताते हैं कि 1528 के पहले तक अयोध्या अपने रौ में थी, रामकोट का इलाका घंटे-घड़ियाल, आरती और भक्तों से ओतप्रोत नजर आता था। 23 मार्च 1528 से पहले श्रीरामजन्मस्थान मंदिर परिसर का व्यवस्थापन श्री पंचरामानंदीय निर्मोही अखाड़ा के पास था, लेकिन 1524 में महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) को हराकर बाबर दिल्ली में तख्तनशीं हुआ।...

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