आधुनिकता के दौर में ना जाने कहां खो गई आत्मीयता की चिठ्ठियां

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कैलाश गहलोत

सोजत. डाकिया डाक लाया, डाकिया डाक लाया, खुशी का पयाम तो कहीं, कहीं दर्द नाम लाया।

फिल्म पलकों की छांव में... का ये गीत आज भी जब कहीं पर सुनाई देता है तो वो दिन याद आ ही जाते हैं जब कभी किसी को संदेश भेजना हो तो चि_ी और पोस्टकार्ड ही माध्यम हुआ करते थे लेकिन अब धीरे-धीरे संचार क्रांति ने चिठ्ठियां भेजने का चलन कम कर दिया है। कुछ समय पहले तक फोन और ईमेल की सुविधा सुलभ नहीं थी और आम जनता के लिए दूर बैठे अपनों तक अपने संदेश पहुंचाने का माध्यम पत्र ही हुआ करता था। उस समय कुरियर सेवाएं भी बहुत कम जगह थी और लोग मूलत: भारतीय डाक सेवा पर ही निर्भर थे। मनीऑर्डर, टेलीग्राम आदि लोगों के लिए काफी उपयोगी हुआ करती थी। हालांकि अब इसका उपयोग कम हो चला है, पर मोबाइल और इमेल के युग में भी डाकसेवाओं के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। भले ही मोबाइल, इंटरनेट और कोरियर युग में डाकिया डाक लाया.. की आवाज अब कहीं गुम होती जा रही हो। महानगरों में लाल बक्सों का महत्व नाममात्र का रह गया हो, परंतु आज भी डाक विभाग भारतीय विरासत का एक अभिन्न अंग है।...

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