न घर बचा न खेत, हम तो दूसरों की दिवाली देखकर मना लेंगे त्योहार

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भोपाल. किसान परिवार हंसी-खुशी जीवनयापन कर रहे थे। फसलें पक चुकी थीं। इससे होने वाली आमदनी से किसी को बच्चों की फीस भरनी थी तो किसी को बेटे-बेटी की शादी करना था। किसानों की आंखों में कई सपने थे। फिर अचानक अतिवृष्टि और बाढ़ से सब तबाह हो गया। आंखें से बहे आंसुओं में सभी सपने बह गए। हजारों परिवार सड़क पर आ गए। इस बारिश ने दिवाली के दीये जलने से पहले ही बुझा दिए। त्योहार का उल्लास बाढ़ में ही मानो बह गया। चेहरों का नूर भी छिन गया। त्योहार मनाना तो दूर की बात, सबसे बड़ी समस्या परिवार के भरण-पोषण की आन पड़ी है।...

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