आचरण में तिल मात्र भी दोष न हो वहीं आचार्य बनते- अपूर्वमति

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आष्टा.

हमेशा त्याग, तप, साधना में दिगंबर जैन संत दिखते हैं। आचरण में तिल मात्र भी दोष न हो वह आचार्य बनते हैं। आचार्य जब चलते हैं तो चार हाथ जमीन को देखकर चलते हैं। आचार्य के प्रथम दर्शन मात्र से मुझे सम्यक दर्शन का मार्ग मिला। उनकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं। 21वीं सदी में सभी आचार्य बनना चाहते हैं लेकिन यह संभव नहीं है। आचार्य एक ऐसे जादूगर हैं जिनकी आंखों में सभी समाया हुआ है। वह इतने बड़े संघ को लेकर चलने वाले संघ नायक, लोकनायक तथा चर्या नायक भी है।

यह बात किला जैन मंदिर में अपूर्वमति माता ने अपने आशीष वचन में कहीं। समाज के प्रवक्ता नरेंद्र गंगवाल ने बताया कि प्रवचन में अपूर्वमति माता ने कहा कि आचार्य ने अपने गुरु ज्ञान सागर महाराज से दीक्षा ली थी और उन्होंने अपने अंतिम समय में विद्यासागर महाराज को आचार्य पदवी देना चाही। विद्या सागर तैयार नहीं थे तो उन्होंने कहा कि मुझे गुरु दक्षिणा चाहिए। गुरु दक्षिणा में उन्होंने कहा कि जो मैं कहूंगा वह मानना है। इस तरह आचार्य को यथा नाम, यथा गुण वाले ज्ञान सागर महाराज गुरु ने आचार्य की पदवी देकर सल्लेखना ली।...

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