'मोतीचूर 🎬चकनाचूर' फ़िल्म रिव्यू: नवाजुद्दीन 🕺और अथिया की वजह से बचती है ये अटपटी👤 मोतीचूर लड्डू

  |   Bolly_Masti / बॉलीवुड

कुछ फिल्मों के लिए कहा जाता है ना कि ज्यादा दिमाग लगाकर देखने की जरूरत नहीं है। वो इसीलिए क्योंकि इससे फिल्म की खामियां मनोरंजन पर हावी होने लगती है। देबमित्रा बिस्वाल के निर्देशन में बनी फिल्म मोतीचूर चकनाचूर भी कुछ ऐसी ही फिल्म है। जहां हंसी मज़ाक तो खूब है, लेकिन कई संवादों पर सवाल भी खड़ा किया जा सकता है। जहां पिछले हफ्ते रिलीज फिल्म 'बाला' में रूपरंग से ऊपर उठने की बात की गई थी, यहां निर्देशक ने इन 'जरूरी' बातों को दरकिनार कर सिर्फ कॉमेडी पर ध्यान कायम रखा।

कहानी है एनी यानि की अनिता (अथिया शेट्टी) की, जो विदेश में रहने वाले लड़के से ही शादी करना चाहती है। वजह भी काफी सिंपल है.. फेसबुक। एनी की सहेलियां अपने पति के साथ विदेश घूम रही हैं और फेसबुक पर उनकी तस्वीरों को देखकर एनी भी फैसला कर लेती है कि वह भी शादी के बाद विदेश जाएगी और तस्वीरें डालकर दोस्तों को जलाएगी। इसी क्रम में एनी अब तक 10 लड़कों को शादी के लिए रिजेक्ट कर चुकी है। ऐसे में एंट्री होती है अनिता के पड़ोसी दुबई रिटर्न पुष्पिंदर त्यागी (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की, जो दिन रात शादी के सपने देखते हुए वापस घर आया है और इस बार छुट्टियों में किसी भी तरह शादी के बंधन में बंधने को लालायित है। अपने भाई से बात करते हुए पुष्पिंदर कहता है- कोई काली, नाटी, मोटी या टकली ही क्यों ना हो, मैं किसी भी लड़की से अब शादी कर लूंगा। पुष्पिंदर दुबई में नौकरी करता है, यह जानकर अनिता उससे प्यार का नाटक करती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन इसके बाद आता है कहानी में ट्विस्ट। क्या झूठ और मजबूरी में की गई यह शादी टिक पाएगी? क्या अनिता विदेश घूमने जा पाएगी? यह देखने के लिए आपको नजदीकि सिनेमाघर में जाना पड़ेगा।

अभिनय की बात की जाए तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी और अथिया शेट्टी अपने किरदारों में खूब जमे हैं। नवाजुद्दीन तो दमदार अभिनेता हैं ही, लेकिन अथिया ने इस फिल्म में सरप्राइज दिया है। शादी के सपने लिए एक मिडिल क्लास लड़की के किरदार में वह आत्म विश्वास से भरपूर और तैयार नजर आई हैं। वहीं, फिल्म में सह कलाकारों की टोली भी काफी उम्दा रही। विभा छिब्बर, नवीन परिहार, करूणा पांडे, संजीव वत्स और अभिषेक रावत जैसे कलाकारों ने फिल्म को एक ताजगी दी है।

निर्देशन और तकनीकि पक्ष की बात की जाए तो इस दिशा में फिल्म औसत रही है। जहां फिल्म का फर्स्ट हॉफ हंसी मजाक में आसानी से गुज़र जाता है, वहीं सेकेंड हॉफ में कहानी थोड़ी गंभीर हो जाती है। क्लाईमैक्स को मजेदार बनाने की पूरी कोशिश की गई है। इस हंसी मजाक के बीच निर्देशक ने दहेज प्रथा जैसे मुद्दों को भी उठाने की कोशिश की है, लेकिन सफल नहीं रही हैं। "भाई की शादी में लिया गया दहेज बहन की शादी में इस्तेमाल होगा".. से कहानी शुरु होकर "दहेज लेकर मैं अपना आत्म सम्मान नहीं खोना चाहता" तक फिल्म में दहेज को लेकर इतनी बातें और तर्क रखे गए हैं कि यह ऊबाऊ हो जाता है। वहीं, फिल्म में कई संवाद ऐसे हैं जो बॉडी शेमिंग को बढ़ावा देते हैं। आश्चर्य है कि निर्देशक ने इन बातों पर ध्यान कैसे नहीं दी। एक मोटी लड़की के परिवार वाले को शादी से इंकार करते हुए यह बोलना कि- तुम्हारी बेटी की जगह हम घर में हाथी ना बांध लें.. शान तो बढ़ेगी! इस तरह के संवाद कहां तक जायज हैं? बाकी फिल्म की सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत के क्षेत्र में फिल्म औसत है।

फोटो - http://v.duta.us/s-sGTwAA

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