'मरजावां' 🎬फ़िल्म रिव्यू: सिद्धार्थ मल्होत्रा और🕺 एक्शन, रोमांस, इंतकाम का खतरनाक💑 ओवरडोज़

  |   Bolly_Masti / बॉलीवुड

''तोडूंगा भी और तोड़ फोड़ के जोडूंगा भी'' इसी तरह की डायलॉगबाजी के साथ एंट्री होती है हीरो की। जो कि एक मुक्के से दस दस गुडों को मार गिराता है, मुंबई की गर्मी में भी लेदर जैकेट पहनता है, एक स्वैग है उसमें, दिल का सच्चा है, नीयत का अच्छा और हीरोइन से पहली नजर में प्यार कर बैठता है। ये दुनिया है निर्देशक मिलाप झावेरी की, जो उन्होंने फिल्म 'मरजांवा' में दिखाने की कोशिश की है।

फिल्म में हीरो है, हीरोइन है, विलेन है, पुलिस है, हीरो के दोस्त हैं, एक चंद्रमुखी है, बदले की आग है.. यानि की हर वो बात, जिसे 80-90 दशक की फिल्मों में होती थी। लेकिन इसके बाद क्या.. कहानी? निर्देशन? एडिटिंग? फिल्म को पूरी तरह से रघु (सिद्धार्थ) के इर्द गिर्द बांध रखा है। माफिया डॉन के लिए काम करता है रघु, आरजू (रकुल प्रीत सिंह) की आबरू बचाता है रघु, जोया के लिए खुद को बदलता है रघु, दोस्तों के लिए दुश्मन से बदला लेता है रघु.. इतना ही नहीं, बल्कि पुलिस (रवि किशन) भी रघु के ही इंतज़ार में रहती है। फिल्म में सभी किरदार रघु के बिना अधूरे हैं।

रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) माफिया डॉन नारायण अन्ना (एम नास्सर) का वफादार है, क्योंकि उन्होंने रघु को गटर को उठाकर पाला पोसा है। रघु उनके एहसान तले इस कदर दबा है कि वह अन्ना के काम में किसी तरह की रूकावट नहीं देख सकता और उनके लिए कुछ भी कर सकता है। रघु की वफादारी और हिम्मत से खुश होकर अन्ना उसे अपने बेटे की तरह मानते हैं। लेकिन यही बात चुभती है उनके अपने बेटे विष्णु (रितेश देशमुख) को। 3 फुट का विष्णु किसी भी तरह रघु को रास्ते से हटाना चाहता है। ऐसे मौके पर रघु की ज़िंदगी में ज़ोया (तारा सुतारिया) आती है, जो बस्ती के बच्चों को हिंसा से दूर और संगीत के करीब करना चाहती है। रघु और जोया का पहली नजर का प्यार परवान चढ़ता ही है कि विष्णु को अपने इंतकाम का मोहरा मिल जाता है। वह कुछ ऐसे हालात पैदा कर देता है, जिसके बाद रघु की जिंदगी में कई बवंडर आते हैं। जहां से उसकी जिंदगी दिशा बदल लेती है और शुरु होता है इंतकाम का खेल।

एक विलेन में जहां सिद्धार्थ और रितेश अपने सर्वश्रेष्ठ अंदाज में थे.. वहीं मरजावां में अभिनय कोई छाप नहीं छोड़ती। विष्णु कहता है- मैं राक्षस नहीं हूं, मैं अवतार हूं अवतार.. लेकिन यह कहते हुए भी वह क्रूर या खतरनाक नहीं लग पाया। रितेश देशमुख एक बेहतरीन अभिनेता हैं और विलेन के किरदार में उनसे काफी उम्मीदे थीं। लेकिन निर्देशक ने विष्णु के किरदार को उस स्तर तक जाने ही नहीं दिया, जहां वो निर्दयी लग सके। रघु के किरदार में सिद्धार्थ एक्शन करते जंचे हैं। लेकिन उनका किरदार भी गहराई में नहीं उतर पाता है। तारा सुतारिया और रकुल प्रीत अपने किरदारों में औसत हैं। वहीं, रवि किशन को पुलिस अफसर के किरदार में कोई खास मौका ही नहीं दिया गया है, जो नाइंसाफी लगती है।

मिलाप झावेरी ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि मैं क्रिटिक के लिए फिल्म नहीं बनाता, दर्शकों के लिए बनाता हूं। हम्म्म.. उन्होंने सही कहा है। 80- 90 के दशक वाली स्टाइल की एक्शन फिल्म बनाना एक बेहतरीन मौका हो सकता था, लेकिन अफसोस निर्देशक ने इसे गंवा दिया। फिल्म की कहानी इतनी ढ़ीली है कि उससे जुड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह एक प्रेम कहानी है, जहां अहसास की कमी है। रघु या जोया की कहानी संवेदनशील होकर भी खुद से जोड़ नहीं पाती। कहना गलत नहीं होगा कि तकनीति पक्ष में फिल्म बेहद कमज़ोर है। माहिर झावेरी की एडिटिंग औसत है। एक सीन से दूसरे सीन का कोई मेल नहीं है। कभी अचानक से गुंडे आकर गोलियां बरसाने लगने लगते हैं, कभी एक औरत अपने बेटे का जनाज़ा ले जाती दिखती है.. तो कभी अचानक से मंदिर- मस्जिद पर चर्चा शुरु हो जाती है। इन सबके पीछे कब, क्यों, कैसे जैसे लॉजिक नहीं लगा सकते।

फोटो - http://v.duta.us/OkRx1gAA

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