लालन पालन में जिन विमंदित बच्चों के लिए गवां दी जवानी, उन्हीं बूढ़ी आंखों के सामने खत्म हो गई उन अधेड़ उम्र के बच्चों की जिंदगानी

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उदयपुर/ कानोड़. human story उन बूढ़ी और पथराई आंखों के सामने एक बार फिर 'समयÓ का अंधेरा छा गया। कुछ समय के लिए उसे दिखना भी बंद हो गया। बहते आंसुओं के बीच वह मां...रामा...रामा...पुकारती रही। बूढ़े ढांचे वाले हाथों को जमीन पर पटकते हुए उसने कई बार दीवार से सिर फोडऩे की कोशिश की और उस भगवान को भी कोंसती रही, जिसने उसकी कोख पर बदनुमा दाग लगाते हुए उसे एक या दो नहीं...तीन पागल बेटे 'सौगातÓ में दिए। लेकिन, दूसरे ही पल उसने खुद को संभालते हुए राहत भरी लंबी सांस भी ली और उसके चेहरे पर एक निष्ठुरता भरा भाव झलकने लगा। उसका यह बनावटी चेहरा एक बार फिर से यह कहते दिखा कि...हे भगवान! मेरे किन्ही अच्छे कर्मों का फल मुझे देना और बदले में मेरे से पहले मेरे बेटों की अर्थी उठा लेना। यह कहानी है कानोड़ निवासी 80 वर्षीय धापू बाई और बूढ़ी मां की...जिसने कोख से पांच बेटों के साथ एक लड़की को जन्म दिया। लेकिन, बेटों की खुशियां इस घर में कब काफुर हो गई। पता ही नहीं चला। पालन-पोषण में पता चला कि कोख से जन्में तीन बच्चे मानसिक रोगी हैं। एक बेटा जैसे-तैसे सरकारी नौकरी में पटवारी बना तो कुदरत ने उसे छीन लिया। एक बेटा गुजरात में मजदूरी कर परिवार का पेट पालता है। बेटी को ब्याहने के बाद भी मां की जिम्मेदारी खत्म नहीं हुई। बूढ़े हाथों से वह तीन पागल बेटों को पालने में डटी रही और भगवान से दुआ करती रही कि उसकी अर्थी के पहले उन बेसहारा बेटों की अर्थी उठे। इस बीच एक मानसिक रोगी पुत्र की एक साल पहले मौत हो गई, जबकि दूसरे का शव गुरुवार को कुएं में मिला। बुधवार को रामा की बहन और जीजा ने कानोड़ आकर तीन दिन से लापता रामा की तलाश शुरू की तो उसका शव बिना मुंडेर वाले कुएं में तैरता दिखा। दु:खों का पहाड़ तो धापू की जिंदगी में तब टूटा जब सांसारिक उलझनों में उलझाकर उनके पति भी दुनिया छोड़ गए।...

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