[neemuch] - संयम बिना आत्मा का कल्याण नहीं - साध्वी अमिदर्षा श्रीजी म.सा.

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नीमच । संयम बिना आत्मा का कल्याण सम्भव नहीं है, छोटे-छोटे तप, त्याग, उपवास से मिलकर बड़ा पूण्य बन जाता है और मानव की आत्मा पवित्र हो जाती है । मानव अशुभ कार्यो को ज्यादा और षुभ कार्यो को ज्यादा टालता है, जबकि अषुभ कार्यो को टालना चाहिए। ताकि पाप कर्म कम हो षुभ कर्म से पुण्य का बैलेंस बढ़ता है । मनुष्य पाप पुण्य में अंतर करे । यह बात साध्वी अमीपूर्णा श्रीजी म.सा. की सुशिष्या साध्वी अमिदर्षा श्रीजी मसा. ने कही।

वे श्री जैन श्वेताम्बर भीड़ भंजन पाश्र्वनाथ मंदिर ट्रस्ट द्वारा पुस्तक बाजार, आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रही थी अमिदर्शा श्रीजी मसा. ने कहा कि 100 ओली की तपस्वी मृदृपूर्वा श्रीजी मसा. का पुण्य कर्म आदर्श सम्मान योग्य कदम है पश्चिमी संस्कृति का त्याग करे । भारतीय संस्कृति ज्ञान सिखाने वाली है आयम्बिल की तपस्या का धर्म लाभ लेना चाहिए । हमें संसार की सम्पति नहीं आत्मिय गुणों का विकास चाहिए, प्रतिदिन प्रार्थना करे कि हमें संयम कब मिलेगा । यदि हम इस जन्म में प्रार्थना करेंगे तो अगले भव में 8 वर्ष की आयु में ही चारित्र मोहनी कर्म को तोड़कर संयम को प्राप्त करेंगे। संयम की षुरूआत छोटे-छोटे त्याग से होती है । इच्छाओं पर ब्रेक लगाना भी संयम है । मानव में षुभ अशुभ इच्छा दोनों होती है, मानव अशुभ पर ब्रेक लगाना चाहिए, लेकिन वह षुभ पर ब्रेक लगाते है।जयती की दीक्षा पर हमें उपवास कर त्याग करना चाहिए । मानव लालच में आकर धर्म के पुण्य कार्य को छोड़ देता है । मानव पुण्य के कार्य को तुरन्त करे और पाप के कार्य के कार्य कल पर छोडऩा चाहिए लेकिन मानव प्रायोगिक तौर पर पाप पहले करता है और पुण्य कर्म को कल पर टाल देता है । तप के लिए छोटा त्याग करना चाहिए उसके लिए नियत्रंण करे तो वह कर्मो की निर्झरा हो जाती है । छोटी-छोटी पाप कर्म की इच्छा का त्याग करे और पुण्य कर्म करे सभी पुण्य कर्म कर एकदिन जयति की तरह पुण्य कर्म का मार्ग पकड़ लेना । जैसा संयम मार्ग है छोडऩे जैसा संसार है 27 दिन भव्य दिक्षा हमने जो मन सिखा उस पर अमल करे संसार असार है । जैन भवन में नीमच से 14 दिक्षा हुई यह दीक्षा ऐतिहासिक रही । ---------------

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