[sagar] - अल्प का मान किया तो विराट से वंचित रह जाओगे: पूर्णमति माताजी

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खुरई. रजवांस ग्राम से विहार करने की पूर्व बेला में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिकाश्री पूर्णमति माताजी ने कहा कि मां जब जन्म देती है तब अपनी पहचान स्वयं बेटे को सिखाती है कि देख मैं मां हूं। फिर पूछती है बोलो मां कहां है, तब वह बेटा इशारा करके बताता है फिर बेटे की स्वयं पहचान कराती है कि तुम कहां हो। तब वह अपने नन्हे-नन्हे हाथ छाती पर रखकर बताता है यह मैं हूं।

आर्यिकाश्री ने कहा कि माता का अर्थ ही जानने वाला होता है। जो मात्र जड़ देह को जन्म देती है वह मां बेटे के भविष्य तक को जानती है तो गुरू जिनने ज्ञान दान देकर आत्मा को जानना सिखाया है या यूं कहें कि सम्यग्ज्ञान को जन्म दिया है। वे क्या नहीं जानते। जो तू नहीं जानता वह सब गुरू जानते हैं। आर्यिकाश्री ने कहा कि सागर को पता है कि बूंद में कितना पानी है और गुरू को पता है कि शिष्य की क्या कहानी है। तू समंदर की एक बूंद का भी एक कतरा-सा जानता है अथाह समंदर के ज्ञान से तू अनजान है इसलिए गुरू कहते हैं मान ले मेरी बात, मान मत कर, अल्प का मान किया तो वहीं तृप्त होकर विराट से वंचित रह जाएगा। आर्यिकाश्री ने कहा कि जो है उसका मान न कर जो पाना शेष है उसका ज्ञान कर, सबकुछ छोड़ दे उनके हाथों में जिनने तुझे वह सब दिया जो सारी दुनिया भी मिलकर न दे पायी। दुनिया चाहे तेरे तुच्छ ज्ञान की प्रशंसा करे पर तू लुढ़क मत जाना क्योंकि तू ही स्वयं नहीं जानता कि तू क्या जानता है वह तो गुरू की पैनी नजर है जो सीधी शिष्य की गहराई में उतरकर जान लेती है कि अभी उसे कितना जानना बाकी है। जब शिष्य ने अपना मालिक ही गुरू को मान लिया तब गुरू ही जान सकते हैं कि तेरे पास कितनी मालकियत है। मेरा ज्ञान मैं क्या जानूं ज्ञान देने वाला जाने कि कितना...

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