आचार्य श्री का देवलोक गमन : विद्यानंद जी का इंदौर से रहा विशेष लगाव

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इंदौर. आचार्यश्री विद्यानंदजी का इंदौर से विशेष लगाव रहा है। भगवान महावीर के 2500 वें निर्वाण महोत्सव पर धर्मचक्र का प्रवर्तन, जनमंगल महाकलश के प्रवर्तन का दायित्व इंदौर को देना, प्रसिद्ध जैन तीर्थ गोम्मटगिरी की स्थापना की प्रेरणा व आकल्पन, वीर निर्वाण ग्रंथ प्रकाश समिति की स्थापना आदि। 95 वर्ष से अधिक आयु में समाधि की सफल साधना की।

कुंदकुंद ज्ञानपीठ के डॉ. अनुपम जैन ने प्रसंग बताते हुए कहा कि शोधकार्य के संदर्भ में 1901 में श्रवणबेलगोला गया था। वहां आचार्य ने बाहुबली पाश्र्वनाथ उपाध्ये के माध्यम से एवं भट्टारक चारुकीर्ति महास्वामी के सहयोग से एक पांडुलिपि के कुछ अंगों का अर्थ बताया, जिससे भारतीय गणित की एक नई कृति प्रकाश में आई। 1987 में कुंदकुंद ज्ञानपीठ की स्थापना आचार्य की प्रेरणा से मनाए जा रहे कुंदकुंद द्विसहसवित महोत्सव के कारण की गई थी। यदि आचार्य की प्रेरणा न होती तो नामकरण कुछ अन्य भी हो सकता था। ज्ञानपीठ की स्थापना के बाद जब आचार्य से मिला तो उन्होंने कहा कि आचार्य कुंदकुंद के नाम को गौरवान्वित करना अब तुम्हारी जिम्मेदारी है। 16 अक्टूबर 1988 में अर्दत वचन शोध त्रैमासिक के प्रवेशोक के ऑडिटोरियम में विमोचन के कुछ समय बाद आपने अपने आशीर्वाद में अर्हत वचन को जैन विद्या के शोध-अनुसंधान के क्षेत्र अंतरर्राष्ट्रीय गौरव मिलने के लिए आशीर्वाद दिया, जो आज 31 वर्ष बाद सार्थक हो रहा है। 22 अप्रैल को आचार्य के जन्म दिवस उनके ही सानिध्य में दिए गए आचार्य नेमीचंद सिद्धांत चक्रवर्ती पुरस्कार के समर्पण के अवसर पर मैंने निवेदन किया कि एक लाख रुपए की धनराशि के पुरस्कार से ज्यादा मूल्यवान वे नोट्स एवं डायरियां हैं जो आपने अपने अध्ययन के आधार पर तैयार की है। तो आचार्य ने कहा कि वे सब सुरक्षित है एवं तुम लोगों के लिए सुरक्षित रहेगी। शासन-प्रशासन से धर्म एवं समाज हित के काम कराने का कौशल उनके पास था। राजनेता उनकी भावनाओं की पूर्ति के लिए प्राण्-पण से जुट जाते थे। ऐस संत समाधि से समाज की अपूर्णीय क्षति हुई है। समाधित्व श्वेतपिच्छाचार्य के चरणों में कोटिश: नमन।...

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