आचार्य श्री विद्यानंदजी भक्तों से बोले : मेरी किसी भी प्रकार की तदाकार प्रतिमा और चरण चिंह आदि न बनाए जाएं

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इंदौर. बचपन में ही खेल ही खेल में कोयोत्सर्ग मुद्रा धारण कर लेने वाले सुरेंद्र ने भले ही हथियार फेक्ट्री और प्रभात स्टूडियों में काम किया हो लेकिन देश और समाज के लिए काम करने की बलवती प्रेरणा बाल्यावस्था से ही कार्य कर रही थी। देश की आजादी में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेकर प्राचीन ग्रंथों की प्राकृत भाषा को हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद कर कई शोध में मदद की है।

आचार्यश्री विद्यानंदजी ने पूरे देश में धूमकर शाकाहार और संस्कार निर्माण का अलख जगाया। नई दिल्ली के बाहर इंदौर में तीन चातुर्मास किए। आचार्य ने कुंदकुंद के काल का निर्धारण भी करवाया। श्रवण बेलगोला में स्थापित भगवान बाहुबली की मूर्ति के स्थापना का काल शोध के माध्यम से तय करवाया। उन्होंने समाज को बताया कि 181 ईसी में मूर्ति की स्थापना हुई। राष्ट्रीय समस्या आने पर प्रधानमंत्री सहित कोई भी राजनेता विचार-विमर्श करने आते थे। वीर निर्वाण ग्रंथ प्रकाशन समिति बनाई और कई ग्रंथों का प्रकाशन हुआ।...

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