‘महिलाएं’ सह रहीं ‘मैला’ ढोने का राष्ट्रीय कलंक

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सर पर मैला ढोना राष्ट्रीय कलंक माना गया है। मैला ढोने की प्रथा खत्म होने का दावा भी किया जा रहा है। दो अक्टूबर 2014 से स्वच्छता अभियान एक मिशन भी बन गया। इसके बाद जनपद को एक वर्ष पूर्व ओडीएफ यानी खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। शहर में ही हर रोज कई मोहल्लों महिलाएं मैला ढो रही हैं। यह मैला खुले में ही डाला जा रहा है। अधिकारी इससे बेखबर हैं।

शहर के मोहल्ला घोड़ा नखास में कब्रिस्तान के सामने घर में अभी भी कमाऊ (शुष्क) शौचालय है। वहां रहने वाले बुजुर्ग बोले, आंखों से दिखता कम है। गरीब हैं। कई बार प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन शौचालय नहीं बना। छोटा बंगसपुरा निवासी महिला के यहां भी कमाऊ शौचालय बना है। वह कहती हैं कि दो बार आवेदन किया।...

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