विश्व गैंडा दिवस पर विशेष-: दुधवा में पांच से बढ़कर 31 हुए गैंडे

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पलियाकलां। तेजी से गायब होने वाली एक सींग की गैंडा प्रजाति को बचाने की मुहिम दुधवा नेशनल पार्क में 35 साल पहले गैंडा पुनर्वास योजना में शुरू हुई थी। इसमें एक सींग वाले गैंडों को बाहर से लाकर दुधवा में बसाया गया। मुश्किल हालात इस परियोजना ने तमाम उतार चढ़ाव देखे, लेकिन अब तक इसका सफर कामयाब रहा। दुुधवा में अब गैंडों की तादाद पांच से बढ़कर 31 हो चुकी है। कल्पना नाम के गैंडे का परिवार बढ़ने वाला है।

35 साल पहले धरती पर एक सींग वाली गैंडा प्रजाति खतरे में आ गई थी। उस समय पूरी दुनिया के वन्यजीव प्रेमी परेशान थे। भारत में 19 अगस्त वर्ष 1981 में वन्य जीव परिषद की एक बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अध्यक्षता में भी हुई थी। इसमें एक सींग वाले गैंडों को बचाने के लिए गहन मंथन किया गया। फिर तय किया गया कि दुधवा नेशनल पार्क में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की जाए। इस पर बाद में अमल किया गया। दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के ककराहा ब्लाक और छोटी पलिया ब्लाक के एक भाग को मिला कर करीब 27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में गैंडा पुनर्वास क्षेत्र का गठन किया गया। 30 मार्च 1984 को असम राज्य के नौगांव वन प्रभाग पवितारा अभ्यारण्य से पांच गैंडों को रुसी विमान सेवा के प्लेन से दिल्ली लाया गया। फिर वहां से ट्रक द्वारा उनको दुधवा में गठित पुनर्वास क्षेत्र में छोड़ दिया गया। गैंडों को पुनर्वास क्षेत्र में लाने वाला दिन एक अप्रैल वर्ष 1984 था। उस समय 12 दिनों की थकान में एक मादा गैंडे की मौत हो गई थी। इसके बाद एक झटका और लगा, जब 31 जुलाई को 1984 को एक और मादा गैंडा आशा भी चल बसी। तब दुधवा में गैंडों की तादाद बस तीन रह गई। इसमें राजू और बांके नर थे और पावित्री मादा। इसको देखते हुए नेपाल के चितवन राष्ट्रीय निकुंज से एक अप्रैल 1985 सन् में सोलह हाथियों के बदले चार मादा गैंडों को दोबारा लाया गया। वर्ष 1989 में मादा गैंडा हिमरानी ने एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद से गैंडों का परिवार बढ़ने लगा। मुश्किल हालातों में गैंडों के परिवार बढ़ने का सफर आगे बढ़ता रहा। 35 साल बाद अब दुधवा में गैंडों की तादाद बढ़कर 31 पहुंच चुकी है। गैंडे की प्रजाति की कल्पना भी गर्भवती है। उसका परिवार भी बढ़ने वाला है। अब आगे भी दुुधवा में गैंडों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है।...

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