मायाचारी दूसरों के लिए नहीं, स्वयं को खतरनाक: आचार्यश्री

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ललितपुर। आचार्यश्री विनिश्चय सागर महाराज ने पर्यूषण पर्व पर ‘आर्जव धर्म’ पर कहा कि कपट के भ्रम में जीना दुखी होने का कारण है। सभी को कपट का त्याग करना चाहिए। उत्तम आर्जव धर्म हमें सिखाता है कि मोह, माया, बुरे काम छोड़कर सरल स्वभाव के साथ परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

श्री जैन अटा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि छलकपट करना मायाचारी है, यदि आप अपने जीवन में आर्जव को लाना चाहते हैं तो इसका त्याग करना होगा। इंद्रियों के विषयों को लुटेरा बताते हुए कहा ये ऐसे लुटेरे हैं, जिनसे लुटते हुए हम बहुत आनंद मानते हैं। जैसा मन में विचार किया जाए, वैसा ही दूसरों से कहा जाए और वैसा ही कार्य किया जाए इस प्रकार मन, वचन और कार्य की सरल प्रवृत्ति में ही आर्जव धर्म प्रकट होता है। प्रारंभ में तत्वार्थसूत्र का वाचन मुनिसंघ के सानिध्य में अंजना बुखारिया ने किया। पूजन कर अर्घ्य प्रद्युम्न कुमार, प्रदीप कुमार के परिवार द्वारा अर्पित किए गए। मंगलाचरण विजय जैन ने किया। पुष्पेंद्र जैन, शादीलाल जैन ने दीया जलाया। धर्मसभा के बाद मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के संयोजन में प्रश्नमंच हुआ, जिसमें जैन अहिंसा मंच की ओर से शीलचंद सराफ और सुदेश गोयल परिवार ने पुरस्कार बांटे।...

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