आजादी के बाद भी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे वन ग्राम के आदिवासी

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बालाघाट. जिले के वन ग्रामों में ग्रामीणजन आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे है। आजादी के बाद से जिले भर के 57 वन ग्राम के लोग बारिश के दिनों में जंगलों के कैद होकर रह जाते हैं। जंगल में पीढ़ी दर पीढ़ी से जीवन व्यतीत करने वाले आदिवासी शिक्षा के अभाव में पिछड़े रहने से आज भी कोदो कुटकी के भरोसे से अपना जीवन चलाने को मजबूर है। गांवों में सड़क पेयजल सहित अन्य मूलभूत बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।

जिले की जनपद पंचायत किरनापुर, परसवाड़ा, लांजी, बिरसा और जनपद पंचायत बैहर में करीब 57 वन ग्राम चिन्हित किए गए है। जिनमें से सभी वन ग्राम जंगलों के बीचों-बीच स्थित रहने से गांवों में आवागमन के साधन सुलभ नहीं करवाएं जा सकें है। देश की आजादी के काफी वर्ष होने के बाद भी जंगलों में वर्षो से गुजर बसर करने वाले आदिवासी आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इन गांवों के ग्रामीण गर्मी और ठंड में शहरों में आकर व आसपास के गांवों में लगने वाले साप्ताहिक हाट बाजार से सामान की खरीदी कर लेते हैं। लेकिन बारिश के दिनों में तीन माह गांव के बाहर निकलना मुश्किल रहता है। इन गांवों को जोडऩे वाली सड़क कच्ची (पगडण्डी) व जर्जर है। जिससे बारिश में आवागमन दूभर हो जाता है।...

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