महज कोर्ट में एफआईआर पेश करने में हुए विलंब से जांच नहीं हो जाती दूषित

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जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा, 'महज कोर्ट में एफआईआर पेश करने में हुए विलंब के आधार पर पूरी जांच को दूषित नहीं कहा जा सकता। जब तक यह साबित न हो जाए कि विलंब आरोपितों को बचाने के लिए किया गया। जस्टिस सुजय पॉल व जस्टिस बीके श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने इस मत के साथ रीवा जिला अदालत की ओर से हत्या के एक मामले में दो आरोपियों को सजा व बाकी को बरी करने के निर्णय को चुनौती देने वाली अपील निरस्त कर दी।

यह है मामला

अभियोजन के अनुसार रीवा जिले के रायपुर करचुलियान का निवासी दिनेश पटवा १९ दिसंबर 2006 को अपने घर के पीछे खड़ा था। तभी गांव के ही धीरेंद्र सिंह, शैलेंद्र सिंह, कृष्णकांत, मुकेश, नरेंद्र, प्रभात अन्य 4-5 लोगों के साथ बाइक पर वहां आए। आते ही सबने दिनेश को लाठियों से पीटना आरंभ कर दिया। शोर होने पर आरोपी भाग निकले। दिनेश को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 व अन्य के तहत प्रकरण दर्ज किया। रीवा जिला अदालत ने 24 नवंबर 2011 को आरोपी धीरेंद्र व शैलेंद्र को हत्या का दोषी पाकर उम्रकैद की सजा सुनाई। जबकि अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। इसी फैसले को मृतक की पत्नी निर्मला पाटकर व आरोपित धीरेंद्र ने अलग-अलग अपीलों में चुनौती दी। दोनों की एक साथ सुनवाई हुई। कोर्ट ने जिला अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए अपीलें निरस्त कर दीं। आरोपी धीरेंद्र की जमानत खारिज कर कोर्ट ने उसे निचली अदालत में सरेंडर करने का निर्देश दिया।

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