[seoni] - गलत भावना में ही कलयुग का वास

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सिवनी. कलियुग का वास तो मनुष्य की गलत भावना में ही होता है। जहां मनुष्य के मन में गलत कार्यों का विचार उत्पन्न होता है। वह कलयुग का सबसे बड़ा संकेत है। कलयुग के प्रभाव से बचना है तो मनुष्य को हमेशा प्रत्येक गलत कार्यों से बचना चाहिए। जो मनुष्य पापकर्म का मार्ग दिखाता है, ऐसे व्यक्ति को जीवन से दूर ही रहना चाहिए। उक्ताशय की बात भागवताचार्य अविनाश तिवारी छुट्टू महाराज ने हरिदर्शन कॉलोनी खैरीटेक में जारी श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ में श्रद्धालुजनों से कही।

उन्होंने आगे कहा कि राजा परीक्षित द्वारा कलयुग को समस्त गलत स्थानों में ही स्थान दिया है। कलयुग को स्वर्ण में दिया है। राजा परीक्षित द्वारा भी अपने राज महल के खजाने से स्वर्ण का मुकुट निकलकर धारण किया। इस कारण राजा परीक्षित के ऊपर भी कलयुग का छाया का आगमन हुआ और श्राप मिला कि सात दिवस के अंदर ही तक्षक नाग के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु होगी। श्राप से बचने के लिए राजा मुनि व संतों की शरण में गए और अंत में अपना सब कुछ त्याग कर संतों के सान्निध्य में श्रीमद्भागवत कथा का सच्चे मन से श्रवण किया तो मुक्ति मिली।

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